सावन में बिहार की 26 नदियां सूखी, खेती पर बढ़ा संकट; धान रोपनी प्रभावित, बिजली और डीजल से सिंचाई का बढ़ा खर्च
पटना। बिहार में सावन का महीना चल रहा है, लेकिन राज्य की 26 नदियों के सूखे होने की स्थिति ने खेती-किसानी को लेकर चिंता बढ़ा दी है। नदियों में पर्याप्त पानी नहीं होने का सीधा असर खेतों की सिंचाई पर पड़ रहा है। कई इलाकों में धान की रोपनी अपेक्षा के मुताबिक नहीं हो सकी है और किसानों को फसल बचाने के लिए बिजली या डीजल पंप से पटवन करना पड़ रहा है। इससे खेती की लागत बढ़ रही है और किसानों की चिंता भी गहराती जा रही है।
बिहार की कृषि व्यवस्था काफी हद तक मानसून और जलस्रोतों पर निर्भर है। सावन का महीना धान की खेती के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी दौरान खेतों में धान की रोपनी बड़े पैमाने पर होती है। ऐसे समय में नदियों में पानी की कमी और पर्याप्त बारिश नहीं होने की स्थिति किसानों के लिए मुश्किल पैदा कर रही है।
नदियों के सूखने का असर केवल खेतों तक सीमित नहीं है। पशुपालकों के सामने भी चारे और पानी की समस्या बढ़ रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां नदियां, आहर, पोखर और अन्य जलस्रोत पशुओं और स्थानीय आबादी के लिए पानी का महत्वपूर्ण स्रोत होते हैं, वहां जलस्तर कम होने से परेशानी बढ़ सकती है।
सावन में नदियों का सूखना चिंता का विषय
सावन को आम तौर पर बारिश और हरियाली का महीना माना जाता है। इस दौरान बिहार के खेतों में कृषि गतिविधियां तेज हो जाती हैं। लेकिन यदि नदियों में पानी नहीं है तो यह स्थिति जल उपलब्धता को लेकर गंभीर संकेत देती है।
राज्य की 26 नदियों का सूखा होना अलग-अलग क्षेत्रों में जल संकट की तस्वीर पेश करता है। नदियों में पानी का प्रवाह कम होने से आसपास के खेतों को मिलने वाला प्राकृतिक जल भी प्रभावित होता है। जिन किसानों के पास पर्याप्त सिंचाई साधन नहीं हैं, उन्हें सबसे अधिक परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
कई ग्रामीण इलाकों में किसान बारिश का इंतजार करते हैं ताकि खेतों में पर्याप्त नमी हो सके। बारिश कम होने की स्थिति में धान की रोपनी में देरी होती है। धान की पौध तैयार होने के बाद भी समय पर रोपनी नहीं हो पाने से किसानों को अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ सकता है।
धान की रोपनी पर सीधा असर
बिहार में धान प्रमुख खरीफ फसलों में शामिल है। धान की खेती के लिए खेतों में पर्याप्त पानी और नमी की आवश्यकता होती है। सामान्य स्थिति में मानसून की बारिश किसानों को रोपनी के लिए आवश्यक पानी उपलब्ध कराती है।
लेकिन इस बार कई इलाकों में जल उपलब्धता को लेकर स्थिति चुनौतीपूर्ण बताई जा रही है। जिन खेतों में पर्याप्त पानी नहीं है, वहां किसान धान की रोपनी नहीं कर पा रहे हैं या उन्हें अतिरिक्त सिंचाई करनी पड़ रही है।
धान की रोपनी में देरी होने से उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है। यदि पौधों की रोपाई उचित समय पर नहीं होती है तो फसल के विकास चक्र में बदलाव आ सकता है। इसका असर अंततः पैदावार और किसानों की आय पर पड़ने की आशंका रहती है।
बिजली और डीजल से पटवन का बढ़ा खर्च
प्राकृतिक जलस्रोतों में पानी की कमी के कारण किसान अब वैकल्पिक सिंचाई साधनों पर निर्भर हो रहे हैं। कई किसान बिजली से चलने वाले मोटर पंप या डीजल पंप का इस्तेमाल कर खेतों में पानी पहुंचा रहे हैं।
डीजल से सिंचाई करना किसानों के लिए महंगा विकल्प है। बार-बार खेत में पानी पहुंचाने के लिए डीजल की जरूरत पड़ती है, जिससे खेती की लागत बढ़ जाती है। जिन किसानों के पास छोटे जोत हैं, उनके लिए अतिरिक्त सिंचाई खर्च आर्थिक दबाव बढ़ा सकता है।
बिजली से सिंचाई अपेक्षाकृत कम खर्चीली हो सकती है, लेकिन इसके लिए नियमित बिजली आपूर्ति और पर्याप्त क्षमता वाले पंप की जरूरत होती है। ग्रामीण इलाकों में बिजली आपूर्ति में किसी तरह की समस्या होने पर किसान दोबारा डीजल पंप की ओर जाने को मजबूर हो सकते हैं।
किसानों की लागत बढ़ने की चिंता
खेती में बीज, खाद, मजदूरी, जुताई, रोपनी और सिंचाई जैसे कई खर्च शामिल होते हैं। यदि बारिश पर्याप्त न हो तो सिंचाई का अतिरिक्त खर्च किसान की कुल लागत बढ़ा देता है।
पहले से ही कृषि लागत बढ़ने की शिकायत करने वाले किसानों के लिए यह अतिरिक्त बोझ चुनौतीपूर्ण हो सकता है। यदि फसल का उत्पादन उम्मीद के मुताबिक नहीं होता है तो लागत और आमदनी के बीच का अंतर और बढ़ सकता है।
किसानों का कहना है कि प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर खेती में मौसम की अनिश्चितता सबसे बड़ी चुनौती बनती जा रही है। समय पर बारिश न होने पर किसानों को निजी साधनों से सिंचाई करनी पड़ती है।
पशु चारा और पानी का संकट
नदियों में पानी की कमी का असर पशुपालन पर भी पड़ सकता है। ग्रामीण परिवारों की आय में पशुपालन की महत्वपूर्ण भूमिका है। गाय, भैंस, बकरी और अन्य पशुओं के लिए पर्याप्त पानी और चारे की जरूरत होती है।
बारिश और जलस्रोतों की कमी से हरे चारे की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। खेतों और आसपास के इलाकों में पर्याप्त हरियाली नहीं होने पर पशुपालकों को चारा खरीदना पड़ सकता है।
पानी की कमी होने पर पशुओं को दूर ले जाकर पानी पिलाना भी पड़ सकता है। इससे पशुपालकों का समय और श्रम दोनों बढ़ते हैं।
ग्रामीण जलस्रोतों पर बढ़ता दबाव
नदियों के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में तालाब, पोखर, आहर, पईन और अन्य पारंपरिक जलस्रोत भी सिंचाई तथा पशुपालन के लिए महत्वपूर्ण हैं। यदि इन जलस्रोतों में भी पर्याप्त पानी नहीं है तो ग्रामीणों की परेशानी और बढ़ सकती है।
कई गांवों में किसान स्थानीय जलस्रोतों से खेतों की सिंचाई करते हैं। जलस्तर कम होने पर इन स्रोतों का उपयोग सीमित हो जाता है। इससे भूजल पर निर्भरता बढ़ सकती है।
लगातार भूजल दोहन लंबे समय में एक अलग समस्या पैदा कर सकता है। इसलिए विशेषज्ञों की नजर में सतही जलस्रोतों के संरक्षण और वर्षा जल संचयन पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है।
छोटे किसानों पर अधिक असर
जल संकट का असर सभी किसानों पर एक जैसा नहीं होता। जिन किसानों के पास निजी बोरिंग, पंप या पर्याप्त सिंचाई संसाधन हैं, वे किसी हद तक फसल को बचा सकते हैं। लेकिन छोटे और सीमांत किसानों के लिए अतिरिक्त सिंचाई खर्च उठाना कठिन हो सकता है।
कई छोटे किसान किराये के पंप या डीजल इंजन से सिंचाई कराते हैं। हर बार पटवन के लिए भुगतान करने से उनकी खेती की लागत बढ़ती जाती है।
यदि बारिश समय पर नहीं होती और नदी या तालाबों में पानी नहीं आता, तो ऐसे किसानों को सबसे अधिक जोखिम उठाना पड़ सकता है।
समय पर बारिश की उम्मीद
किसानों की नजर अब आने वाले दिनों की बारिश पर टिकी है। यदि अच्छी बारिश होती है तो खेतों में नमी बढ़ सकती है और धान की रोपनी में तेजी आ सकती है। साथ ही नदियों और अन्य जलस्रोतों में भी पानी का स्तर बढ़ने की संभावना रहेगी।
लेकिन यदि बारिश में और देरी होती है तो किसानों को लगातार वैकल्पिक सिंचाई साधनों पर निर्भर रहना पड़ेगा। इससे लागत बढ़ने के साथ फसल उत्पादन को लेकर अनिश्चितता भी बनी रह सकती है।
प्रशासन के सामने भी चुनौती
नदियों के सूखने और खेती पर पड़ रहे असर के बीच प्रशासन के सामने भी चुनौती है। किसानों को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने, बिजली आपूर्ति बेहतर रखने और जरूरत पड़ने पर कृषि विभाग के माध्यम से सलाह और सहायता उपलब्ध कराने की आवश्यकता होगी।
जिन क्षेत्रों में धान की रोपनी प्रभावित है, वहां स्थानीय स्तर पर स्थिति का आकलन करना जरूरी है। किसानों को वैकल्पिक फसलों, सिंचाई तकनीकों और उपलब्ध सरकारी योजनाओं की जानकारी भी दी जा सकती है।
जल प्रबंधन पर दीर्घकालिक योजना जरूरी
बिहार में मानसून की अनिश्चितता को देखते हुए दीर्घकालिक जल प्रबंधन की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है। केवल बारिश पर निर्भर रहने के बजाय वर्षा जल को संरक्षित करने और पारंपरिक जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने पर ध्यान देना होगा।
नदियों, तालाबों और आहर-पईन जैसी संरचनाओं के संरक्षण से खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लंबे समय में फायदा मिल सकता है। इसके अलावा सिंचाई परियोजनाओं और सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को भी बढ़ावा दिया जा सकता है।
किसानों की उम्मीदें बारिश पर टिकीं
फिलहाल बिहार के किसानों की सबसे बड़ी उम्मीद आसमान से होने वाली बारिश पर टिकी है। सावन के दौरान यदि पर्याप्त बारिश होती है तो धान की रोपनी में तेजी आ सकती है और सूखी नदियों तथा अन्य जलस्रोतों में भी पानी का स्तर सुधर सकता है।
वहीं, यदि बारिश कमजोर रहती है तो बिजली और डीजल से सिंचाई पर निर्भरता बढ़ेगी और किसानों की लागत में और इजाफा हो सकता है। इसका असर पशुपालन, चारे की उपलब्धता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
बिहार में सावन के महीने में 26 नदियों का सूखा होना खेती और जल प्रबंधन दोनों के लिए गंभीर संकेत माना जा रहा है। आने वाले दिनों में बारिश की स्थिति यह तय करेगी कि किसानों को राहत मिलती है या जल संकट और गहराता है। फिलहाल किसानों को मौसम के साथ-साथ उपलब्ध सिंचाई संसाधनों का बेहतर प्रबंधन करने की जरूरत है, जबकि प्रशासन के सामने किसानों और ग्रामीण आबादी को संभावित जल संकट से राहत दिलाने की बड़ी जिम्मेदारी है।