श्रावणी मेले में कांवरियों का सैलाब बोलबम के जयकारों से गूंजा कांवरिया मार्ग; कोई लेट-लेट कर तो कोई दंडवत करते हुए पहुंच रहा बाबाधाम, अटूट आस्था का अद्भुत नजारा
सुल्तानगंज: देवघर के देवाधिदेव महादेव बाबा बैद्यनाथ धाम की यात्रा पर निकले शिवभक्तों की आस्था का ज्वार इन दिनों चरम पर है। सुल्तानगंज के उत्तरवाहिनी गंगा तट से जल उठाकर देवघर की ओर जाने वाले मुख्य कांवरिया मार्ग पर इन दिनों ऐसा विहंगम और अलौकिक दृश्य देखने को मिल रहा है, जिसे देखकर हर कोई भक्तिभाव से सराबोर हो रहा है। मंगलवार का दिन होने के कारण कांवरिया मार्ग पर शिवभक्तों की भीड़ और भी अधिक उमड़ पड़ी है। केसरिया वस्त्रों में रंगे इस रास्ते पर जिधर नजर जाती है, उधर केवल 'बोलबम' और 'हर-हर महादेव' के गगनभेदी जयकारे ही सुनाई दे रहे हैं। इस मार्ग पर विभिन्न अनोखे अंदाज में यात्रा करने वाले कांवरिये आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं—कोई दंडवत करते हुए तो कोई साष्टांग प्रणाम करते हुए या लेट-लेट कर (दंडी यात्रा) अपनी कठिन मनोकामनाओं को लेकर बाबा के दरबार की ओर बढ़ते जा रहे हैं।
भक्ति और साधना का मार्ग: कैसा है कांवरिया पथ का नजारा?
श्रावणी मेले के दौरान सुल्तानगंज से बाबाधाम की लगभग 108 किलोमीटर लंबी यह पदयात्रा दुनिया की सबसे कठिन और अनूठी धार्मिक यात्राओं में मानी जाती है:
केसरियामय हुआ पूरा परिवेश: बच्चे, युवा, बुजुर्ग और महिलाएं—सभी आयु वर्ग के श्रद्धालु केवल और केवल शिव भक्ति में लीन नजर आ रहे हैं। पूरा मार्ग केसरिया रंग में पट चुका है।
अथक परिश्रम और अटूट विश्वास: रास्ते की तमाम कठिनाइयों, छाले पड़े पैरों और भीषण उमस के बावजूद कांवरियों के कदम जरा भी नहीं डगमगा रहे हैं। उनके चेहरे पर थकान के बजाय बाबा के दर्शन की एक अलग ही चमक और संतोष साफ झलक रहा है।
तरह-तरह के कांवरिये: साधना की अनूठी बानगी
इस कांवरिया मार्ग की सबसे बड़ी विशेषता यहां नजर आने वाले विभिन्न प्रकार के व्रत और साधना के तरीके हैं, जो सनातन संस्कृति की गहराई को दर्शाते हैं:
दंडी कांवरिये (लेटकर यात्रा करने वाले): मंगलवार को मार्ग पर ऐसे दर्जनों कांवरिये दिखे जो जमीन पर लेट-लेट कर साष्टांग दंडवत करते हुए आगे बढ़ रहे हैं। यह साधना शारीरिक रूप से बेहद कष्टसाध्य होती है, लेकिन इनकी श्रद्धा इतनी प्रगाढ़ होती है कि ये कई किलोमीटर का सफर इसी प्रकार तय करते हैं।
डाक कांवरिये (तेज गति से दौड़ने वाले): ये वे विशेष कांवरिये होते हैं जो एक निश्चित समय (आमतौर पर 24 घंटे के भीतर) में अजगैवीनाथ का गंगाजल लेकर बिना रुके दौड़ते हुए बाबा बैद्यनाथ पर जलार्पण करते हैं। इनकी गति और ऊर्जा देखने लायक होती है।
पारिवारिक और सामूहिक जत्थे: गांवों और शहरों से आए टोलियों के रूप में कांवरिये भजन-कीर्तन करते हुए, डमरू बजाते हुए और एक-दूसरे का हाथ थामे अनुशासनबद्ध तरीके से आगे बढ़ रहे हैं।
महिला और युवा कांवरियों का जोश: इस बार के मेले में महिला कांवरियों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है, जो सिर पर कांवड़ उठाए पूरी ऊर्जा के साथ बाबा की राह पर बढ़ रही हैं।
मंगलवार के दिन विशेष महत्व और उमड़ी भीड़
हिंदू धर्म में मंगलवार का दिन भगवान हनुमान और संकटमोचन के साथ-साथ शिव साधना के लिए भी अत्यंत शुभ माना जाता है:
विशेष जलार्पण की तैयारी: मंगलवार को बाबाधाम पहुंचने के लिए हजारों की संख्या में शिवभक्तों ने सोमवार शाम और मंगलवार सुबह सुल्तानगंज से जल उठाया। मान्यता है कि इस दिन यात्रा शुरू करने या बाबा को जल चढ़ाने से विशेष फलों की प्राप्ति होती है।
मार्ग पर जनसैलाब: स्थिति यह है कि सुल्तानगंज से लेकर देवघर सीमा तक पूरा कांवरिया पथ कांवरियों के रेले से पट गया है। सड़क के दोनों ओर सेवा शिविरों में भी भक्तों की भारी भीड़ जुटी हुई है।
जगह-जगह सेवा शिविरों की बहार, मानवता की अनोखी मिसाल
कांवरिया मार्ग पर चलने वाले इन भक्तों की सेवा के लिए सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा जगह-जगह भंडारे और शिविर लगाए गए हैं:
निःशुल्क चिकित्सा और विश्राम: शिविरों में कांवरियों के पैरों की मालिश, छाले के इलाज के लिए दवाइयां, नींबू पानी, चाय और भरपेट भोजन की निःशुल्क व्यवस्था की गई है।
आपसी भाईचारा: इस मार्ग की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यहां जात-पात, ऊंच-नीच और अमीर-गरीब का कोई भेद नहीं रहता। हर कोई केवल 'बम' कहकर एक-दूसरे की मदद करता नजर आता है।
कांवरिया मार्ग पर मंगलवार के दिन उमड़ा यह जनसैलाब और तरह-तरह के कांवरियों की अनूठी साधना इस बात का जीवंत प्रमाण है कि भारत में आस्था और विश्वास की जड़ें कितनी गहरी हैं। कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपनी निष्ठा से अडिग रहने वाले ये शिवभक्त समाज को त्याग, तपस्या और समर्पण का संदेश दे रहे हैं। बोलबम के जयकारों के बीच आगे बढ़ते इन कांवरियों के कदम न केवल बाबाधाम की ओर बढ़ रहे हैं, बल्कि यह यात्रा भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा की अटूट धुरी को भी और अधिक मजबूत कर रही है।