नवगछिया अनुमंडल के तटबंधों पर हरियाली का दावा कागजी या धरातल पर? बाढ़, कटाव और लापरवाही की भेंट चढ़े करोड़ों के पौधे

भागलपुर/नवगछिया (विशेष संवाददाता): पर्यावरण संरक्षण, हरित आवरण को बढ़ाने और नदियों के तटबंधों को मजबूत करने के लिए सरकार हर साल करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाती है। बड़े-बड़े विज्ञापनों में हरी-भरी तस्वीरें छपती हैं और कागजों पर 'लाखों पौधे लगाने' का भव्य लक्ष्य हासिल कर लिया जाता है। लेकिन, जब इन दावों की हकीकत जानने के लिए धरातल पर उतरें, तो जो सच सामने आता है वह बेहद चिंताजनक है। भागलपुर जिले के संवेदनशील नवगछिया अनुमंडल क्षेत्र के अंतर्गत गंगा और कोसी नदियों के तटबंधों पर चलाए गए पौधरोपण अभियान की सच्चाई कुछ ऐसी ही दास्तान बयां करती है। यहाँ कागजों में भले ही तटबंधों को हरा-भरा दिखाया गया हो, लेकिन हकीकत में या तो अधिकांश पौधे बाढ़ और कटाव की भेंट चढ़ चुके हैं या फिर विभागीय उदासीनता और मवेशियों की भेंट चढ़कर दम तोड़ चुके हैं।

क्या है नवगछिया के तटबंधों पर पौधरोपण की वास्तविक तस्वीर?

भागलपुर जिले में गंगा, कोसी और अन्य सहायक नदियों के किनारे बने बांधों और तटबंधों की लंबाई सबसे अधिक नवगछिया अनुमंडल क्षेत्र में है। बाढ़ के लिहाज से अतिसंवेदनशील माने जाने वाले इस इलाके में सुरक्षा और हरियाली दोनों के लिहाज से पौधरोपण को बेहद अहम माना गया था:

वर्षों पुराने अभियानों का हाल: कुछ साल पहले 'नमामि गंगे' और अन्य हरित योजनाओं के तहत नवगछिया के विभिन्न तटबंधों पर बड़े पैमाने पर पौधे लगाए गए थे। उस वक्त योजना के प्रचार-प्रसार के लिए तस्वीरें भी खूब खिंचवाई गईं। लेकिन आज स्थिति यह है कि उन अभियानों के निशान तक कई जगहों पर गायब हो चुके हैं।

रिंग बांध और मुख्य तटबंधों की स्थिति: इस्माईलपुर, खरीक, गोपालपुर और बिहपुर जैसे इलाकों में गंगा और कोसी के कछार पर बने रिंग बांधों व तटबंधों पर लगाए गए पौधे या तो हर साल आने वाली प्रलयकारी बाढ़ के पानी में बह गए या तेज कटाव में विलीन हो गए। स्परों के आस-पास छिटपुट पेड़ों को छोड़कर अधिकांश तटबंध वीरान पड़े हैं।

कटाव और बाढ़: पौधों के उजड़ने का सबसे बड़ा प्राकृतिक कारण

नवगछिया का भू-भाग हर साल बाढ़ और नदी के कटाव का दंश झेलता है। यहाँ के तटबंधों पर हरियाली टिक न पाने के पीछे प्राकृतिक कारण भी कम जिम्मेदार नहीं हैं:

नर्म मिट्टी और तेज बहाव: मानसून के दिनों में गंगा और कोसी का जलस्तर जब उफान पर होता है, तो तटबंधों की मिट्टी अत्यधिक नर्म हो जाती है। पानी के तेज थपेड़ों और तीव्र बहाव के कारण मिट्टी का कटाव तेजी से होता है, जिससे मिट्टी में मजबूती से जड़े नहीं जमा पा रहे नए पौधे कटकर नदी में समा जाते हैं।

हर साल की तबाही: पिछले कुछ वर्षों में इस्माईलपुर-बिंदटोली और सैदपुर जैसे इलाकों में जिस तरह से तटबंध के बड़े हिस्से और स्पर बाढ़ की भेंट चढ़े हैं, उसके साथ वहां लगे हज़ारों पेड़-पौधे भी नेस्तनाबूद हो गए।

मानवीय लापरवाही और देखरेख का अभाव: कागजों तक सिमटी योजनाएं

प्रकृति की मार के अलावा प्रशासनिक महकमे की लापरवाही और संरक्षण की घोर कमी ने इस 'फोटो पौधरोपण' की पोल खोलकर रख दी है:

सुरक्षा के नाम पर कुछ नहीं: नियमानुसार पौधरोपण के बाद शुरुआती कुछ वर्षों तक पौधों की सुरक्षा के लिए ट्री-गार्ड (गेवियन) या बैरिकेडिंग की व्यवस्था होनी चाहिए और उनकी नियमित सिंचाई व देखरेख होनी चाहिए। लेकिन धरातल पर सुरक्षा के लिए लगाए गए अधिकांश गेवियन या तो वर्षों पहले टूट चुके हैं या चोरी हो चुके हैं।

मवेशियों का चरना और जलावन का उपयोग: तटबंधों के आसपास बसी आबादी और स्थानीय पशुपालकों के मवेशी अक्सर इन पौधों की हरी पत्तियों को चट कर जाते हैं। इसके अलावा, ठंड या रोजमर्रा के इस्तेमाल के लिए आसपास के लोग इन पौधों की लकड़ियों को काटकर जलावन के रूप में उपयोग कर लेते हैं, और विभाग गहरी नींद में सोया रहता है।

विभाग का पक्ष और अधिकारियों के दावे

इस पूरे मामले पर जब वन विभाग और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों से बात की जाती है, तो उनके अपने तर्क होते हैं:

वन प्रमंडल पदाधिकारी (DFO) का कहना है कि विभाग की ओर से समय-समय पर तटबंधों की मजबूती और पर्यावरण संतुलन के लिए हजारों पौधे लगाए गए हैं। उनका यह भी मानना है कि पेड़ों की जड़ें (विशेषकर बांस या अन्य मजबूत प्रजातियां) तटबंध की मिट्टी को ठोस बनाने में मदद करती हैं।

हालांकि, विभाग यह भी स्वीकार करता है कि बाढ़ प्रभावित क्षेत्र होने के कारण हर साल प्राकृतिक नुकसान बहुत ज्यादा होता है, और आगामी सत्र में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम के साथ पौधरोपण की दरों को बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा।

नवगछिया अनुमंडल के तटबंधों पर पौधरोपण का सच यह आईना दिखाता है कि केवल कागजी आंकड़ों और उद्घाटन के समय फोटो खिंचवाने की संस्कृति से पर्यावरण या तटबंधों की सुरक्षा संभव नहीं है। जब तक पौधों के क्रय से लेकर उनके बड़े होने तक 'सर्वाइवल रेट' (जीवित रहने की दर) की मॉनिटरिंग सख्त नहीं होगी और स्थानीय लोगों को इसकी सुरक्षा से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक हर साल बजट का यह पैसा इसी तरह बाढ़ और लापरवाही की भेंट चढ़ता रहेगा। आवश्यकता इस बात की है कि प्रशासन दिखावे की बजाय धरातल पर मजबूत और पारदर्शी कार्ययोजना तैयार करे, तभी नवगछिया के तटबंधों पर असल मायनों में हरियाली उतर सकेगी