बिहटा में ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर 1.05 करोड़ की साइबर ठगी, आरोपी आर्यन कुमार गिरफ्तार; मोबाइल, सिम और चेकबुक बरामद

 पटना: बिहार में साइबर अपराध के बढ़ते मामलों के बीच पटना जिले के बिहटा थाना क्षेत्र से एक बड़ा मामला सामने आया है। पुलिस ने राघोपुर एसएस कॉलोनी से कथित तौर पर ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर करीब 1.05 करोड़ रुपये की साइबर ठगी करने के आरोप में एक युवक को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तार आरोपी की पहचान आर्यन कुमार के रूप में बताई गई है।

पुलिस के अनुसार, आरोपी के पास से दो मोबाइल फोन, चार सिम कार्ड और एक चेकबुक बरामद की गई है। प्रारंभिक जांच में पुलिस को आशंका है कि इन इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और बैंकिंग दस्तावेजों का इस्तेमाल साइबर ठगी से जुड़े लेनदेन और संपर्क के लिए किया गया होगा। मामले की जांच जारी है और पुलिस आरोपी से पूछताछ कर साइबर ठगी के पूरे नेटवर्क तक पहुंचने का प्रयास कर रही है।

‘डिजिटल अरेस्ट’ साइबर अपराध का ऐसा तरीका है, जिसमें अपराधी खुद को पुलिस, सीबीआई, ईडी, नारकोटिक्स विभाग या किसी अन्य सरकारी एजेंसी का अधिकारी बताकर पीड़ित को डराते हैं। इसके बाद वीडियो कॉल या फोन के जरिए उसे कथित जांच के नाम पर घंटों या कई दिनों तक संपर्क में रखते हैं और पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर करते हैं।

राघोपुर एसएस कॉलोनी से हुई गिरफ्तारी

पटना पुलिस की कार्रवाई के दौरान बिहटा थाना क्षेत्र के राघोपुर एसएस कॉलोनी से आरोपी को गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने आरोपी के पास से दो मोबाइल फोन और चार सिम कार्ड बरामद किए हैं।

इसके अलावा एक चेकबुक भी बरामद की गई है। पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि बरामद मोबाइल नंबरों और बैंकिंग दस्तावेजों का इस्तेमाल किन लोगों से संपर्क करने और पैसों के लेनदेन के लिए किया जाता था।

जांच एजेंसियां आरोपी के मोबाइल फोन की कॉल डिटेल, चैट, बैंकिंग गतिविधियों और डिजिटल लेनदेन की जानकारी खंगाल सकती हैं। इससे कथित साइबर ठगी में शामिल अन्य लोगों की पहचान करने में मदद मिल सकती है।

1.05 करोड़ रुपये की ठगी का आरोप

इस मामले में सबसे गंभीर आरोप करीब ₹1.05 करोड़ की साइबर ठगी का है। इतनी बड़ी रकम की ठगी ने पुलिस और साइबर जांच एजेंसियों की चिंता बढ़ा दी है।

पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि कथित ठगी की रकम किस खाते में पहुंची, किन बैंक खातों के माध्यम से उसे आगे ट्रांसफर किया गया और इस पूरी प्रक्रिया में कितने लोग शामिल थे।

साइबर अपराधों में ठगी की रकम अक्सर कई बैंक खातों के माध्यम से स्थानांतरित की जाती है। ऐसे में पुलिस के सामने केवल आरोपी की भूमिका की जांच ही नहीं, बल्कि पूरे आर्थिक नेटवर्क का पता लगाने की चुनौती भी होती है।

कैसे काम करता है ‘डिजिटल अरेस्ट’ का जाल?

‘डिजिटल अरेस्ट’ साइबर अपराधियों की एक नई और बेहद डर पैदा करने वाली रणनीति है।

अपराधी पहले संभावित पीड़ित को फोन करते हैं। वे दावा कर सकते हैं कि पीड़ित के नाम से कोई संदिग्ध पार्सल भेजा गया है, किसी बैंक खाते का इस्तेमाल अवैध गतिविधि में हुआ है या किसी गंभीर अपराध की जांच में उसका नाम सामने आया है।

इसके बाद कॉल को कथित रूप से किसी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी या जांच एजेंसी के अधिकारी से जोड़ दिया जाता है।

पीड़ित को वीडियो कॉल पर आने के लिए कहा जाता है। अपराधी नकली पहचान पत्र, सरकारी लोगो, पुलिस की वर्दी और फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल करके अपने दावे को वास्तविक दिखाने की कोशिश करते हैं।

डर के माहौल में पीड़ित से कहा जाता है कि वह किसी से संपर्क न करे और जांच पूरी होने तक ‘डिजिटल अरेस्ट’ में रहे।

डराकर बैंक खाते से पैसे कराते हैं ट्रांसफर

साइबर अपराधियों का मुख्य उद्देश्य पीड़ित को मानसिक दबाव में डालना होता है।

वे गिरफ्तारी, जेल, संपत्ति जब्ती या बैंक खाते बंद होने जैसी धमकियां देकर पीड़ित को डराते हैं। इसके बाद कथित जांच या सत्यापन के नाम पर बैंक खाते में मौजूद पैसे को किसी अन्य खाते में ट्रांसफर करने के लिए कहा जाता है।

कई मामलों में अपराधी यह दावा करते हैं कि ट्रांसफर की गई रकम जांच पूरी होने के बाद वापस कर दी जाएगी।

वास्तव में रकम अपराधियों के नियंत्रण वाले खातों में पहुंचने के बाद उसे तेजी से अलग-अलग खातों में भेज दिया जाता है।

बरामद मोबाइल और सिम की होगी जांच

पुलिस ने आरोपी के पास से दो मोबाइल फोन और चार सिम कार्ड बरामद किए हैं। ये उपकरण जांच में महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।

जांच के दौरान पुलिस मोबाइल फोन में मौजूद कॉल रिकॉर्ड, मैसेज, सोशल मीडिया चैट, बैंकिंग एप्लीकेशन और अन्य डिजिटल गतिविधियों की जांच कर सकती है।

सिम कार्ड से यह पता लगाने की कोशिश की जा सकती है कि आरोपी किन नंबरों से संपर्क में था और इन नंबरों का इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया गया।

यदि किसी संगठित साइबर गिरोह से संबंध सामने आता है तो पुलिस अन्य आरोपियों तक पहुंचने के लिए भी कार्रवाई कर सकती है।

चेकबुक से भी मिल सकते हैं सुराग

आरोपी के पास से चेकबुक बरामद होना भी जांच के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

पुलिस बैंक खाते से जुड़े दस्तावेजों और लेनदेन की जांच कर सकती है। चेकबुक से संबंधित बैंक खाता किसके नाम पर है और उसमें हाल के दिनों में किस तरह के लेनदेन हुए हैं, इसकी जानकारी जांच में अहम हो सकती है।

यदि खाते में संदिग्ध रकम जमा या निकासी की जानकारी मिलती है तो पुलिस उस लेनदेन की कड़ी को आगे जोड़ सकती है।

साइबर ठगी के नेटवर्क की जांच

पुलिस की कोशिश केवल आरोपी को गिरफ्तार करने तक सीमित नहीं रहती। बड़े साइबर ठगी मामलों में यह पता लगाना जरूरी होता है कि आरोपी के पीछे कौन लोग काम कर रहे थे।

साइबर अपराध में अलग-अलग लोगों की अलग-अलग भूमिका हो सकती है। कोई व्यक्ति फर्जी सिम या बैंक खाता उपलब्ध करा सकता है, कोई पीड़ितों से संपर्क कर सकता है और कोई ठगी की रकम को दूसरे खातों में स्थानांतरित करने का काम कर सकता है।

इसलिए आर्यन कुमार से पूछताछ के आधार पर पुलिस अन्य संदिग्धों की भूमिका की भी जांच कर सकती है।

डिजिटल सबूत अहम होंगे

इस तरह के मामलों में डिजिटल सबूत जांच की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

मोबाइल फोन, सिम कार्ड, बैंक खातों, कॉल रिकॉर्ड, इंटरनेट गतिविधियों और डिजिटल भुगतान से संबंधित जानकारी को एक साथ जोड़कर पुलिस कथित अपराध की पूरी कड़ी तैयार कर सकती है।

यदि पीड़ित से हुई बातचीत या किसी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भेजे गए संदेश बरामद होते हैं तो वे भी जांच में उपयोगी हो सकते हैं।

लोगों को सतर्क रहने की जरूरत

बिहटा का यह मामला एक बार फिर बताता है कि साइबर अपराधी लोगों को डराकर बड़ी रकम हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं।

किसी भी सरकारी एजेंसी की ओर से फोन या वीडियो कॉल पर इस तरह पैसे ट्रांसफर करने का दबाव बनाए जाने पर लोगों को तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए।

यदि कोई व्यक्ति खुद को पुलिस या जांच एजेंसी का अधिकारी बताकर गिरफ्तारी की धमकी देता है, तो बिना सत्यापन के कोई पैसा ट्रांसफर नहीं करना चाहिए।

‘डिजिटल अरेस्ट’ वास्तव में क्या है?

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ‘डिजिटल अरेस्ट’ कोई वास्तविक कानूनी गिरफ्तारी की प्रक्रिया नहीं है।

साइबर अपराधी इस शब्द का इस्तेमाल लोगों को डराने और मानसिक दबाव बनाने के लिए करते हैं। किसी व्यक्ति को केवल फोन या वीडियो कॉल के जरिए कानूनी रूप से ‘डिजिटल अरेस्ट’ नहीं किया जा सकता।

इसलिए ऐसी कॉल आने पर घबराने के बजाय कॉल को सत्यापित करना जरूरी है।

फर्जी पुलिस अधिकारी से रहें सावधान

साइबर ठग अक्सर पुलिस अधिकारी जैसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं। वे पीड़ित को यह विश्वास दिलाने की कोशिश करते हैं कि उसके खिलाफ गंभीर मामला दर्ज हो चुका है।

कई बार वे वीडियो कॉल के दौरान पुलिस स्टेशन जैसा दिखने वाला नकली बैकग्राउंड भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

लोगों को यह समझना चाहिए कि स्क्रीन पर दिखाई देने वाली वर्दी, पहचान पत्र या कार्यालय वास्तविक होने की गारंटी नहीं है।

बैंकिंग जानकारी साझा न करें

किसी भी अनजान व्यक्ति के साथ बैंक खाते की जानकारी, एटीएम कार्ड का विवरण, ओटीपी, यूपीआई पिन या इंटरनेट बैंकिंग पासवर्ड साझा नहीं करना चाहिए।

यदि कोई व्यक्ति सरकारी अधिकारी होने का दावा करते हुए तत्काल पैसे ट्रांसफर करने को कहता है, तो यह साइबर ठगी का बड़ा संकेत हो सकता है।

बैंक या सरकारी विभाग से संबंधित किसी भी संदिग्ध कॉल की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करनी चाहिए।

परिवार और बुजुर्गों को जागरूक करना जरूरी

‘डिजिटल अरेस्ट’ के कई मामलों में अपराधी ऐसे लोगों को निशाना बनाते हैं जो सरकारी प्रक्रिया या साइबर सुरक्षा के बारे में कम जानकारी रखते हैं।

परिवार के सदस्यों, विशेषकर बुजुर्गों को इस तरह के अपराधों के बारे में जानकारी देना जरूरी है।

उन्हें बताया जाना चाहिए कि कोई भी वास्तविक अधिकारी फोन पर डराकर तुरंत पैसे ट्रांसफर करने का दबाव नहीं बनाता।

पुलिस की जांच से खुलेंगे और राज

बिहटा पुलिस अब गिरफ्तार आरोपी से पूछताछ के जरिए इस मामले की पूरी जानकारी जुटाने की कोशिश कर रही है।

दो मोबाइल फोन, चार सिम कार्ड और चेकबुक से मिलने वाले डिजिटल और बैंकिंग सुराग जांच को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

पुलिस यह भी जांच कर सकती है कि कथित तौर पर ठगी गई 1.05 करोड़ रुपये की रकम कहां गई और क्या इसका संबंध किसी बड़े साइबर अपराध नेटवर्क से है।

यदि जांच में अन्य लोगों की भूमिका सामने आती है तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जा सकती है।

पटना के बिहटा थाना क्षेत्र के राघोपुर एसएस कॉलोनी से कथित ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर ₹1.05 करोड़ की साइबर ठगी के मामले में आर्यन कुमार की गिरफ्तारी ने साइबर अपराध के बढ़ते खतरे को फिर सामने ला दिया है।

पुलिस ने आरोपी के पास से दो मोबाइल फोन, चार सिम कार्ड और एक चेकबुक बरामद की है। इन सामानों की जांच से कथित ठगी के नेटवर्क और पैसों के लेनदेन से जुड़े महत्वपूर्ण सुराग मिलने की उम्मीद है।

यह मामला लोगों के लिए भी एक महत्वपूर्ण चेतावनी है। किसी भी अनजान व्यक्ति द्वारा पुलिस, सीबीआई, ईडी या किसी अन्य सरकारी एजेंसी का अधिकारी बनकर डराने, वीडियो कॉल पर पूछताछ करने या पैसे ट्रांसफर करने का दबाव बनाने पर तुरंत सतर्क होना चाहिए।