श्रावणी मेले में दोनों हाथों के बल सुल्तानगंज से देवघर की कठिन यात्रा तय कर रहे दिव्यांग कांवरिया राजीव सिंह; अटूट आस्था की यह मिसाल पूरे देश को कर रही है प्रेरित

भागलपुर/देवघर (विशेष संवाददाता): दुनिया की सबसे कठिन और श्रद्धा से ओत-प्रोत मानी जाने वाली विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेला यात्रा में इस बार भी एक ऐसी दास्तान सामने आई है, जिसने इंसानियत के जज्बे, अदम्य साहस और भगवान भोलेनाथ के प्रति अटूट आस्था की परिभाषा ही बदल दी है। भागलपुर से लेकर देवघर तक के इस पावन मार्ग पर इन दिनों हर किसी की जुबान पर सिर्फ एक ही नाम है—राजीव सिंह। शारीरिक सीमाओं को अपनी कमजोरी बनाने के बजाय अपनी ताकत बना चुके दिव्यांग कांवरिया राजीव सिंह इस वर्ष भी दोनों हाथों के बल अपनी कठिन कांवर यात्रा पूरी कर रहे हैं। किसी भी शारीरिक बाधा को अपनी राह का रोड़ा न बनने देने वाले राजीव का यह लगातार सातवां वर्ष है, जब वे सुल्तानगंज से उत्तर वाहिनी गंगा का जल उठाकर दोनों हाथों के सहारे जमीन पर चलते हुए देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथ धाम पहुँच रहे हैं। उनकी यह अलौकिक यात्रा न केवल लाखों श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणास्त्रोत बन चुकी है, बल्कि यह साबित करती है कि यदि इरादे मजबूत हों, तो भगवान भी अपने ऐसे अनन्य भक्तों की हर मुराद पूरी करने के लिए मार्ग प्रशस्त कर देते हैं।

श्रावणी मेला और कांटों भरा सफर: क्या है राजीव सिंह की प्रेरणादायक यात्रा?

श्रावणी मेले के दौरान सुल्तानगंज से देवघर तक की लगभग 105 किलोमीटर लंबी पदयात्रा सामान्य और स्वस्थ इंसानों के लिए भी किसी कठिन परीक्षा से कम नहीं होती। कंकर-पत्थर, तपती धूप, बारिश, और भारी भीड़ के बीच चलना अपने आप में एक चुनौती है। ऐसे में दोनों पैरों से दिव्यांग होने के बावजूद राजीव सिंह का दोनों हाथों के सहारे इस लंबी दूरी को तय करना किसी चमत्कार से कम नहीं है:

लगातार सातवां साल: राजीव सिंह कोई पहली बार यह यात्रा नहीं कर रहे हैं। पिछले कई वर्षों से लगातार वे इसी जज्बे के साथ सावन के पवित्र महीने में बाबा भोलेनाथ के दरबार में हाजिरी लगाने पहुँचते हैं। इस बार उनका यह सातवां साल है, जो उनके संकल्प की दृढ़ता को बयां करता है।

हाथों में विशेष सुरक्षा और टेप का सहारा: दोनों हाथों के बल आगे बढ़ने के कारण उनके हाथों की हथेलियों पर घर्षण से बचने के लिए वे विशेष सुरक्षा उपाय (जैसे मोटे ग्‍लव्स और टेप) का इस्तेमाल करते हैं। हर एक इंच आगे बढ़ना उनके शरीर के लिए अत्यधिक श्रम और दर्द भरा होता है, लेकिन उनके चेहरे पर दर्द का कोई शिकन नहीं, बल्कि महादेव के प्रति अपार समर्पण का भाव दिखाई देता है।

राजीव सिंह की जुबानी: "जब तक सांसें हैं, बाबा की सेवा में यूं ही चलता रहूँगा"

राजीव सिंह से जब इस कठिन यात्रा और उनके मन में उठने वाले भावों के बारे में पूछा गया, तो उनका जवाब हर सुनने वाले की आंखें नम कर देने के लिए काफी था। उन्होंने पूरी विनम्रता और दृढ़ता के साथ कहा:

"लोग कहते हैं कि मैं दिव्यांग हूँ, लेकिन जब मैं बाबा भोलेनाथ का स्मरण करता हूँ, तो मुझे अपने भीतर एक असीम ऊर्जा महसूस होती है। मेरे दोनों पैर भले ही काम न करते हों, लेकिन भगवान ने मुझे हाथ और बुलंद हौसला तो दिया है। मेरी आस्था ही मेरी ताकत है। जब तक शरीर में प्राण हैं, मैं हर साल इसी तरह दोनों हाथों के बल बाबाधाम आकर भोलेनाथ का जलाभिषेक करता रहूँगा। बाबा की कृपा से ही मुझे यह शक्ति मिलती है।"

मार्ग में उमड़ती भीड़ और कांवरियों द्वारा अद्भुत स्वागत

जब राजीव सिंह कांवर मार्ग (जैसे असरगंज, कटोरिया, बांका, और दुमका रूट) से गुजरते हैं, तो वहाँ का नजारा देखने लायक होता है:

श्रद्धालुओं की आंखें नम: रास्ते में जब अन्य कांवरिया और स्थानीय ग्रामीण राजीव को दोनों हाथों के बल आगे बढ़ते देखते हैं, तो वे अपनी थकान भूलकर उनके चरणों में नतमस्तक हो जाते हैं। लोग उन्हें रास्ते में रोककर उनके इस जज्बे को सलाम करते हैं और उनकी यात्रा मंगलमय होने की कामना करते हैं।

प्रशासन और सेवा शिविरों का विशेष सम्मान: कांवर मार्ग पर जगह-जगह लगाए गए सेवा शिविरों के संचालक और स्वयंसेवक राजीव सिंह के पहुँचने पर उनका भव्य स्वागत करते हैं। उन्हें प्राथमिक उपचार, फल और जल ग्रहण कराकर उनकी हौसलाअफजाई की जाती है। पुलिस प्रशासन के अधिकारी भी उनकी सुरक्षा और सुविधा का विशेष ध्यान रखते हैं।

कठिनाइयों के बीच आस्था का प्रकाश

राजीव सिंह की यह यात्रा इस बात का सबसे बड़ा उदाहरण है कि शारीरिक विकलांगता कभी भी आपके सपनों और आपकी निष्ठा के बीच दीवार नहीं बन सकती:

मानसिक शक्ति का प्रतीक: जहां आज के दौर में लोग छोटी-छोटी परेशानियों से घबरा जाते हैं, वहीं राजीव सिंह जैसे लोग यह सिखाते हैं कि दृढ़ इच्छाशक्ति से बड़ी से बड़ी बाधा को भी बौना किया जा सकता है।

युवाओं के लिए प्रेरणा: श्रावणी मेले में आने वाले युवा कांवरियों के लिए राजीव एक जीवंत मिसाल बन चुके हैं। उन्हें देखकर युवा पीढ़ी यह सीख रही है कि जीवन में कितनी भी कठिनाइयां आएं, कभी हार नहीं माननी चाहिए।

श्रावणी मेले के इस पावन अवसर पर दिव्यांग कांवरिया राजीव सिंह की यह दोनों हाथों के बल तय की जाने वाली यात्रा सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन के सबसे खूबसूरत और प्रेरणादायी पन्नों में से एक है। बाबा बैद्यनाथ के प्रति उनकी यह भक्ति और अटूट आस्था न सिर्फ देवघर की इस कांवड़ यात्रा को बल्कि पूरे समाज को यह संदेश देती है कि सच्ची लगन और निष्ठा के आगे कुदरत और शारीरिक सीमाएं भी घुटने टेक देती हैं। राजीव सिंह का यह सफर आने वाली पीढ़ियों तक लोगों को प्रेरित करता रहेगा।