पूर्णिया विश्वविद्यालय में नियुक्ति प्रक्रिया: दस्तावेजों की जांच में खुली पोल, असिस्टेंट प्रोफेसर की अनुशंसा पर उड़े सवाल
बिहार के शिक्षा जगत में उस समय एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया जब पूर्णिया विश्वविद्यालय में संविदा सहायक प्राध्यापक (Contractual Assistant Professor) की नियुक्ति प्रक्रिया के दौरान एक बड़ी गड़बड़ी सामने आई। बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग (BSUSC), पटना द्वारा हिंदी विषय के लिए एक ऐसी अभ्यर्थी की नियुक्ति की अनुशंसा कर दी गई, जिसके पास असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए अनिवार्य एवं निर्धारित 'नेट' (NET) की अहर्त्ता ही नहीं थी। पूर्णिया विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा जब ज्वाइनिंग से पहले दस्तावेजों का गहन सत्यापन (Document Verification) किया गया, तो इस गंभीर विसंगति का खुलासा हुआ। इसके बाद विश्वविद्यालय ने आयोग को पत्र लिखकर संबंधित अभ्यर्थी की नियुक्ति अनुशंसा को तत्काल रद्द करने या वापस लेने की मांग की है। इस घटना ने राज्य के विभिन्न विश्वविद्यालयों और डिग्री कॉलेजों में चल रही चयन प्रक्रियाओं की पारदर्शिता और दस्तावेजों की प्रारंभिक जांच पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं।
क्या है पूरा मामला और कैसे हुआ खुलासा?
पूर्णिया विश्वविद्यालय के अंतर्गत विभिन्न अंगीभूत एवं डिग्री कॉलेजों में संविदा आधारित सहायक प्राध्यापकों के पदों पर बहाلی की प्रक्रिया चल रही है। इसी क्रम में बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग, पटना ने हिंदी विषय के लिए कुछ अभ्यर्थियों के नामों की अनुशंसा विश्वविद्यालय को भेजी थी।
दस्तावेजों की जांच में पकड़ी गई गड़बड़ी: विश्वविद्यालय के प्रशासनिक स्तर पर जब नवनियुक्त अभ्यर्थियों के प्रमाण पत्र और शैक्षणिक दस्तावेजों की जांच की जा रही थी, तब हिंदी विषय के अंतर्गत चयनित एक अभ्यर्थी हेमा कुमारी के कागजातों की बारीकी से छानबीन की गई।
नेट (NET) पात्रता का अभाव: जांच के दौरान यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि संबंधित अभ्यर्थी के पास असिस्टेंट प्रोफेसर के पद के लिए यूजीसी द्वारा निर्धारित अनिवार्य ‘नेट’ (National Eligibility Test) की पात्रता या योग्यता नहीं थी। इसके बावजूद आयोग के स्तर से उनका नाम अनुशंसा सूची में शामिल कर दिया गया था।
विश्वविद्यालय प्रशासन का सख्त कदम: आयोग से अनुशंसा रद्द करने की मांग
अपनी आंतरिक जांच प्रक्रिया में इस प्रकार की भारी गड़बड़ी और पात्रता की अनदेखी सामने आने के बाद पूर्णिया विश्वविद्यालय प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए कड़ा रुख अपनाया है।
बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग को पत्र: पूर्णिया विश्वविद्यालय ने गत 16 अगस्त को बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग, पटना के सचिव को आधिकारिक पत्र प्रेषित कर दिया है। इस पत्र में विश्वविद्यालय ने स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि चूंकि अभ्यर्थी निर्धारित न्यूनतम शैक्षणिक अहर्त्ता (नेट) पूरी नहीं करती हैं, इसलिए उनकी नियुक्ति की अनुशंसा को तत्काल प्रभाव से रद्द या वापस लिया जाए।
भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल: विश्वविद्यालय के इस कदम के बाद यह मामला तूल पकड़ता जा रहा है। शिक्षाविदों और जानकारों का मानना है कि यदि आयोग के स्तर पर ही दस्तावेजों की प्राथमिक जांच में इतनी बड़ी चूक हो रही है, तो यह चयन आयोग की कार्यप्रणाली पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाता है।
संविदा सहायक प्राध्यापक भर्ती और अन्य कॉलेजों पर प्रभाव
यह पूरा मामला केवल एक विश्वविद्यालय या एक अभ्यर्थी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके दायरे में पूरे बिहार के डिग्री कॉलेजों में चल रही नियुक्तियां आ रही हैं।
राज्यभर की नियुक्तियों पर नजर: वर्तमान में बिहार के विभिन्न जिलों के अंगीभूत एवं डिग्री कॉलेजों में संविदा आधारित शिक्षकों की बहाली की प्रक्रिया विभिन्न चरणों में पूरी की जा रही है। ऐसे में पूर्णिया विश्वविद्यालय द्वारा पकड़ी गई इस गड़बड़ी ने अन्य विश्वविद्यालयों में भी प्रशासनिक सतर्कता को बढ़ा दिया है।
सख्त सत्यापन निर्देश: इस घटना के सामने आने के बाद अब अन्य विश्वविद्यालय भी ज्वाइनिंग से पहले अभ्यर्थियों के मूल प्रमाण पत्रों, नेट/स्लेट स्कोरकार्ड और अन्य डिग्रियों की बेहद कड़ी जांच करने लगे हैं ताकि किसी भी अपात्र व्यक्ति को नियुक्ति न मिल सके।
प्रशासनिक पारदर्शिता और आगे की कार्रवाई
पूर्णिया विश्वविद्यालय के इस साहसिक और पारदर्शी कदम की हर ओर चर्चा हो रही है, क्योंकि विश्वविद्यालय ने बिना किसी दबाव के तुरंत स्तर पर आपत्ति दर्ज कराई है।
नियमों का सख्त पालन: विश्वविद्यालय के उच्च अधिकारियों का कहना है कि उच्च शिक्षा की गुणवत्ता से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता है। नियमानुसार जो भी अभ्यर्थी सभी मानदंडों को पूरा करेंगे, केवल उन्हीं को शिक्षण कार्य का अवसर मिलेगा।
आयोग के अगले कदम का इंतजार: अब सबकी निगाहें बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग (BSUSC) पर टिकी हैं कि वह पूर्णिया विश्वविद्यालय के इस पत्र के जवाब में क्या आधिकारिक कदम उठाता है और क्या इस प्रकार की अन्य अनुशंसाओं की भी समीक्षा की जाती है या नहीं।
पूर्णिया विश्वविद्यालय में दस्तावेजों की जांच के दौरान सामने आई यह गड़बड़ी इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि प्रशासनिक स्तर पर सतर्कता कितनी आवश्यक है। बिना नेट पात्रता के असिस्टेंट प्रोफेसर पद के लिए नाम की अनुशंसा होना और फिर विश्वविद्यालय द्वारा उस पर आपत्ति जताते हुए अनुशंसा रद्द करने की मांग करना, उच्च शिक्षा व्यवस्था में शुचिता बनाए रखने की दिशा में एक अहम कदम है।