ऐसा स्थानांतरण हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय के कार्यालय आदेश 61/2022 को बताया अवैध, विवि से कॉलेजों में ट्रांसफर पर लगाई कड़ी रोक
भागलपुर (वरीय संवाददाता): देश के विश्वविद्यालयों में कार्यरत गैर-शिक्षण कर्मचारियों (Non-Teaching Employees) के प्रशासनिक कैडर, यूनिट और उनकी सेवा शर्तों को लेकर पटना उच्च न्यायालय (Patna High Court) ने एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने अपने एक स्पष्ट फैसले में यह व्यवस्था दी है कि विश्वविद्यालय मुख्यालय से किसी भी कर्मी का स्थानांतरण अंगीभूत कॉलेजों (Constituent Colleges) में नहीं किया जा सकता है। अदालत ने अपने इस ऐतिहासिक आदेश के तहत विश्वविद्यालय द्वारा 10 जून 2022 को जारी किए गए विवादास्पद कार्यालय आदेश संख्या 61/2022 को पूरी तरह से अवैध और निरस्त घोषित कर दिया है। न्यायालय की यह टिप्पणी केवल एक व्यक्तिगत मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्यभर के विश्वविद्यालयों में होने वाले मनमाने प्रशासनिक तबादलों पर एक बड़ा कानूनी शिकंजा कसती है।
क्या था पूरा मामला और क्यों पहुंचा कोर्ट?
यह पूरा कानूनी विवाद भागलपुर स्थित तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय (TMBU) से जुड़ा हुआ है:
यूनिट परिवर्तन का विरोध: विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा प्रशासनिक इकाई (TMBU Unit) से हटाकर एक सेक्शन ऑफिसर (SO) कानन राजू का स्थानांतरण अंगीभूत कॉलेज इकाई में कर दिया गया था।
लंबी कानूनी लड़ाई: याचिकाकर्ता कानन राजू ने इस आदेश के खिलाफ लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी और कोर्ट को बताया कि यह स्थानांतरण विश्वविद्यालय के स्थापित नियमों और प्रावधानों के पूरी तरह खिलाफ है। याचिकाकर्ता के अनुसार, वे पिछले 23 वर्षों से इस प्रशासनिक मनमानी के खिलाफ न्याय की गुहार लगा रहे थे।
हाईकोर्ट का फैसला: मामले की गंभीरता को समझते हुए पटना हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति रितेश कुमार की अदालत ने इस याचिका पर सुनवाई पूरी की और 10 अगस्त को अपना अहम फैसला सुनाया। अदालत ने याचिकाकर्ता के दावों को पूरी तरह सही ठहराते हुए विश्वविद्यालय के उस आदेश को खारिज कर दिया जिसके तहत उन्हें कॉलेज इकाई में भेजा गया था।
हाईकोर्ट द्वारा स्पष्ट की गई कैडर और यूनिट व्यवस्था
अपने फैसले में हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालयों के गैर-शिक्षण कर्मचारियों की संरचना और उनकी कार्य इकाइयों (Units) को बहुत ही स्पष्ट रूप से परिभाषित किया है:
यunit-1 (मुख्यालय इकाई): अदालत ने स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालय कार्यालय, उससे संबंधित केंद्रीय इकाइयां, स्नातकोत्तर (PG) विभाग और विश्वविद्यालय की तमाम प्रशासनिक शाखाएं 'यूनिट-1' के अंतर्गत आती हैं।
यूनिट-2 (कॉलेज इकाई): इसके विपरीत, तमाम अंगीभूत महाविद्यालय (Constituent Colleges) और उनसे जुड़ी उप-इकाइयां 'यूनिट-2' का हिस्सा हैं।
पारस्परिक स्थानांतरण पर रोक: न्यायालय ने कानूनी व्याख्या करते हुए यह कड़ा निर्देश दिया कि यूनिट-1 के किसी भी कर्मचारी को यूनिट-2 में और यूनिट-2 के किसी कर्मचारी को यूनिट-1 में स्थानांतरित नहीं किया जा सकता है, क्योंकि दोनों के कैडर और कार्य क्षेत्र पूरी तरह पृथक हैं।
"कुलपति के पास भी नहीं है ऐसी शक्ति" - अदालत की बड़ी टिप्पणी
इस फैसले का सबसे अहम और चौकाने वाला पहलू वह कानूनी बिंदु है जो विश्वविद्यालय के सर्वोच्च प्रशासनिक पद यानी कुलपति (Vice-Chancellor) की शक्तियों से जुड़ा है:
बिहार स्टेट यूनिवर्सिटी एक्ट 1976 का हवाला: अदालत ने बिहार राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 1976 (Bihar State Universities Act 1976) की धारा 10(18) [Section 10 (18)] का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि इस अधिनियम के तहत कुलपति को जो सामान्य प्रशासनिक शक्तियां प्राप्त हैं, उसके दायरे में भी वे इस तरह का अंतर-इकाई (Inter-Unit) स्थानांतरण करने के हकदार नहीं हैं।
कानूनी सीमाएं: दूसरे शब्दों में कहें तो, विश्वविद्यालय के कुलपति के पास भी यह अधिकार नहीं है कि वे नियमों को ताक पर रखकर विश्वविद्यालय मुख्यालय के किसी कर्मी को कॉलेज इकाई में या इसके विपरीत स्थानांतरित कर सकें।
कार्यालय आदेश 61/2022 का निरस्त होना और उसके निहितार्थ
विश्वविद्यालय द्वारा 10 जून 2022 को जो कार्यालय आदेश (संख्या 61/2022) जारी किया गया था, उसे अदालत ने विधि सम्मत नहीं माना:
आदेश रद्द: हाईकोर्ट ने उस आदेश को प्रभावहीन घोषित कर दिया है जिसके आधार पर कर्मचारियों के कैडर नियमों की अनदेखी की जा रही थी।
मूल इकाई में वापसी का आदेश: अदालत ने संबंधित कर्मचारी को तत्काल प्रभाव से वापस विश्वविद्यालय इकाई (यूनिट-1) में पदस्थापित करने और वहीं से उनका वेतन भुगतान सुनिश्चित करने का सख्त निर्देश दिया है।
कर्मचारियों में खुशी की लहर, अधिकारियों के समक्ष खड़ी हुई चुनौती
हाईकोर्ट के इस स्पष्ट और कड़े फैसले के बाद विश्वविद्यालय के गैर-शिक्षण कर्मचारियों में खुशी की लहर दौड़ गई है। कर्मचारियों का मानना है कि इस फैसले से विश्वविद्यालयों में मनमाने ढंग से होने वाली प्रशासनिक कार्रवाई पर लगाम लगेगी। याचिकाकर्ता ने विश्वविद्यालय प्रशासन (कुलपति और कुलसचिव) से यह औपचारिक मांग की है कि वे बिना किसी विलम्ब के इस न्यायालय आदेश का अक्षरशः पालन करें तथा रद्द किए गए स्थानांतरण आदेश के आधार पर भविष्य में किसी भी प्रकार की प्रतिकूल कार्रवाई से बचें। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि विश्वविद्यालय प्रशासन इस कानूनी शिकंजे के बाद अपनी प्रशासनिक व्यवस्था को किस प्रकार नियमों के दायरे में लेकर आता है।