जलस्तर में वृद्धि से गंभीर हो जाती है बाढ़ की विभीषिका; जिला प्रशासन द्वारा 138 नावें तैनात, पर क्या महज नावों से मिल पाएगा इस प्राकृतिक आपदा का स्थायी समाधान?

बिहार के भूगोल और यहाँ की जीवनशैली में नदियों का एक विशेष स्थान रहा है, लेकिन यही नदियाँ जब मानसून के मौसम में उफ़नती हैं, तो यह जीवनदायिनी धाराएँ कब अभिशाप बन जाती हैं, इसका अंदाजा कोसी और गंगा बेसिन के इलाकों में रहने वाले लोगों से बेहतर शायद ही कोई लगा सकता है। बिहार में बाढ़ की स्थिति किसी एक कारक पर निर्भर नहीं करती, बल्कि यह मुख्य रूप से गंगा नदी के जलस्तर और मानसून की अनिश्चित कृपा पर टिकी होती है। जब-जब कोसी और गंगा के जलस्तर में अभूतपूर्व वृद्धि होती है, तब-तब निचले इलाकों में बाढ़ की स्थिति भयावह और गंभीर रूप धारण कर लेती है।

पूर्णिया, कोसी और सीमांचल के इलाकों में बाढ़ की इस विभीषिका से निपटने के लिए जिला प्रशासन द्वारा हर साल प्रशासनिक तैयारियां की जाती हैं। वर्तमान में जिला आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा प्रभावित क्षेत्रों के लिए 138 नावों की व्यवस्था की गई है, ताकि आपात स्थिति में लोगों को निकाला जा सके। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या यह प्रशासनिक प्रबंध इस विनाशकारी समस्या का कोई स्थायी समाधान है? आइए मानसून के मिजाज, गंगा-कोसी के जलस्तर के समीकरण, जिला प्रशासन की तैयारियों और बाढ़ के स्थायी निदान की आवश्यकता का विस्तार से विश्लेषण करते हैं।

पर्यावरणीय और भौगोलिक समीकरण: क्यों गंगा और मानसून पर टिकी है कोसी की बाढ़?

कोसी नदी को 'बिहार का शोक' कहा जाता है, और इसके पीछे एक जटिल भौगोलिक व जलवैज्ञानिक तंत्र काम करता है।

मानसून की मेहरबानी और मूसलाधार बारिश: नेपाल के पहाड़ी जलग्रहण क्षेत्रों (Catchment Areas) और बिहार के मैदानी इलाकों में जब मानसून सक्रिय होता है, तब अचानक भारी बारिश से कोसी नदी का जलस्तर तेजी से ऊपर भागने लगता है।

गंगा का बैकवाटर इफ़ेक्ट (Backwater Effect): कोसी नदी आगे चलकर गंगा में मिलती है। यदि उसी दौरान गंगा नदी का जलस्तर भी उफ़ान पर होता है, तो कोसी का पानी तेजी से आगे नहीं निकल पाता। गंगा के दबाव के कारण कोसी का पानी वापस बैकफ्लो होकर आसपास के गांवों, खेतों और बस्तियों में फैल जाता है। यही कारण है कि जानकारों का मानना है कि कोसी की बाढ़ सीधे तौर पर मानसून की तीव्रता और गंगा के जलस्तर के उतार-चढ़ाव पर निर्भर करती है।

जलस्तर में वृद्धि: जब सामान्य जनजीवन बन जाता है संघर्ष

जैसे ही कोसी नदी के जलस्तर में खतरे के निशान से ऊपर की वृद्धि दर्ज की जाती है, वैसे ही तटीय इलाकों के लोगों की सांसे अटक जाती हैं।

सैकड़ों गांवों का संपर्क टूटना: जलस्तर बढ़ते ही सड़कों पर पानी फैल जाता है, पुल-पुलिया डूब जाते हैं और दर्जनों गांवों का जिला मुख्यालय से संपर्क पूरी तरह कट जाता है। लोगों को रोजमर्रा की चीजों के लिए भी भारी मशक्कत करनी पड़ती है।

फसलों और आजीविका की बर्बादी: बाढ़ का पानी खेतों में भर जाने से किसानों की खड़ी फसलें नष्ट हो जाती हैं। पशुओं के लिए चारे का संकट पैदा हो जाता है और गरीब परिवारों के सामने रोजी-रोटी की विकट समस्या खड़ी हो जाती है।

प्रशासनिक तैयारियां: जिला आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा 138 नावों की तैनाती

हर साल आने वाली इस आपदा से निपटने के लिए जिला प्रशासन और आपदा प्रबंधन विभाग अपनी ओर से सतर्कता बरतने का दावा करता है।

नावों की व्यवस्था: इस बार की आपातकालीन तैयारियों के तहत जिला आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा कुल 138 नौकाओं (Boats) की व्यवस्था की गई है। इन नावों को संवेदनशील और बाढ़ग्रस्त पंचायतों के घाटों पर तैनात किया जा रहा है, ताकि जलस्तर बढ़ने पर लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुँचाया जा सके।

राहत और बचाव के अन्य दावे: इसके अलावा गोताखोरों की तैनाती, पॉलीथिन शीट का वितरण और राहत शिविरों (Relief Camps) को चिन्हित करने की प्रक्रिया भी प्रशासन द्वारा पूरी की जाती है, ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटा जा सके।

क्या नाव और राहत सामग्री ही स्थायी समाधान है?

यह सबसे बड़ा और विचारणीय प्रश्न है कि क्या हर साल आने वाली इस आपदा का सामना केवल नावों और प्लास्टिक शीट के सहारे किया जा सकता है?

अस्थाई व्यवस्थाओं की सीमा: जिला प्रशासन द्वारा मुहैया कराई गई 138 नावें और राहत सामग्रियां उस समय तात्कालिक रूप से राहत तो दे सकती हैं, जब बाढ़ आ चुकी होती है, लेकिन यह कोई स्थायी समाधान (Permanent Solution) नहीं हैं।

दीर्घकालिक योजनाओं का अभाव: तटबंधों (Embankments) की समय पर मरम्मती न होना, सिल्टिंग (Siltation) के कारण नदियों के पेट का उथला होना और जल निकासी की उचित व्यवस्था का अभाव ऐसी मूल समस्याएं हैं, जिन पर जब तक ठोस काम नहीं होगा, तब तक हर साल यही दृश्य दोहराया जाता रहेगा

गंगा और मानसून की अनिश्चित कृपा पर निर्भर कोसी नदी की बाढ़ की स्थिति यह साबित करती है कि प्रकृति के आगे इंसानी इंतजाम अक्सर कम पड़ जाते हैं। जिला आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा की गई 138 नावों की व्यवस्था आपातकाल में मददगार जरूर साबित हो सकती है, लेकिन यह इस विकराल समस्या का कोई स्थायी विकल्प नहीं है। यदि सरकार और प्रशासन को इस क्षेत्र के लोगों को हर साल बाढ़ के इस अभिशाप से बचाना है, तो केवल राहत कार्यों तक सीमित रहने के बजाय नदियों के गाद (Silt) प्रबंधन, मजबूत तटबंधों के निर्माण और दीर्घकालिक वैज्ञानिक योजनाओं पर गंभीरता से काम करना होगा, तभी इस समस्या का स्थायी समाधान निकल सकेगा।