सबौर के रजंदीपुर और शंकरपुर में गंगा का तांडव संतनगर में पीसीसी सड़क और दर्जनों घर नदी में समाए; मची भगदड़ के बाद लोग घर खाली कर सुरक्षित ठिकानों की ओर पलायन को विवश

सबौर/भागलपुर : भागलपुर जिले के सबौर प्रखंड अंतर्गत रजंदीपुर पंचायत के संतनगर और आसपास के इलाकों में उफनाई गंगा नदी का भीषण कटाव (Erosion) शुरू हो गया है, जिससे पूरे क्षेत्र में तबाही का मंजर देखने को मिल रहा है। गंगा के आक्रामक तेवर के कारण संतनगर में हाल ही में बनी पक्की पीसीसी (PCC) सड़क का बड़ा हिस्सा कटकर नदी में विलीन हो चुका है। सड़क के धंसने और कटाव का दायरा तेजी से बढ़ने के कारण दर्जनों घरों पर मंडराते खतरे को देख ग्रामीण दहशत में हैं। लोग अपनी आंखों के सामने अपने आशियानों को उजड़ते देख अपने घरों को खाली कर मवेशियों और बाल-बच्चों के साथ सुरक्षित एवं ऊंचे स्थानों की ओर पलायन करने को विवश हो गए हैं। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने राहत और बचाव कार्यों को तेज कर दिया है, लेकिन ग्रामीणों का गुस्सा और डर कम होने का नाम नहीं ले रहा है।

 (संतनगर और शंकरपुर में कटाव का खौफनाक मंजर)

सबौर और रजंदीपुर पंचायत के दियारा एवं तटीय इलाकों में हर साल बाढ़ और कटाव एक अभिशाप बनकर आता है, लेकिन इस बार का कटाव पिछले कई वर्षों के रिकॉर्ड तोड़ रहा है:

संतनगर में पीसीसी सड़क का कटाव: स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, संतनगर मोहल्ले को मुख्य मार्ग से जोड़ने वाली जिस पीसीसी सड़क पर लोग कल तक गर्व महसूस कर रहे थे, उसका बड़ा हिस्सा नदी के तेज बहाव में देखते ही देखते कटकर समा गया। सड़क के कटने से आवापगमन पूरी तरह ठप हो गया है।

शंकरपुर में भी जारी है तबाही: संतनगर के साथ-साथ नजदीकी शंकरपुर गांव में भी गंगा का कटाव विकराल रूप धारण कर चुका है। पानी का बहाव सीधे तटों और बसावट की ओर होने के कारण उपजाऊ जमीन और रिहायशी इलाके लगातार नदी में समा रहे हैं।

दर्जनों घर खतरे की जद में: कटाव का यह सिलसिला जिस रफ्तार से चल रहा है, उससे संतनगर और शंकरपुर के दर्जनों मकान कभी भी गंगा में समा सकते हैं। लोग खुद ही अपने हाथों से अपने पक्के-कच्चे घरों की ईंटें और टिन-एस्बेस्टस उखाड़कर सुरक्षित स्थानों पर ले जाते नजर आ रहे हैं।

घर छोड़ने को विवश ग्रामीण, मची चीख-पुकार

कटाव स्थल का नजारा बेहद हृदयविदारक है। जिन परिवारों ने अपनी जिंदगीभर की कमाई और खून-पसीने की गाढ़ी कमाई से अपने आशियाने बनाए थे, वे आज अपने ही घरों को उजाड़ने को मजबूर हैं:

सुरक्षित ठिकानों की ओर पलायन: सिर पर गृहस्थी का सामान लादे महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग ऊंचे बांधों, सड़कों के किनारे या रिश्तेदारों के यहां शरण लेने के लिए जा रहे हैं। कई परिवारों ने खुले आसमान के नीचे प्लास्टिक तानकर डेरा डालना शुरू कर दिया है।

मवेशियों के चारे का संकट: विस्थापित हो रहे परिवारों के सामने सबसे बड़ी समस्या अपने पालतू पशुओं (गाय, भैंस, बछड़े) को बचाने और उनके लिए चारे की व्यवस्था करने की आ खड़ी हुई है।

प्रशासन की हरकत और राहत सामग्री का वितरण

घटना की सूचना मिलते ही सबौर प्रखंड प्रशासन और अंचल कार्यालय की टीम हरकत में आ गई है:

राहत और बचाव कार्य शुरू: स्थानीय प्रशासन ने कटाव पीड़ित परिवारों के बीच तिरपाल, सूखा राशन और राहत सामग्री का वितरण शुरू कर दिया है। अधिकारियों का कहना है कि प्रभावित परिवारों को हरसंभव प्रशासनिक मदद पहुंचाई जा रही है।

बालू भरी बोरियों से कटाव रोकने की कोशिश: अंचल प्रशासन द्वारा स्थिति को नियंत्रित करने के लिए कुछ स्थानों पर एंटी-इरोजन वर्क (बालू भरी बोरियां डालकर कटाव रोकने का प्रयास) शुरू किया गया है, हालांकि गंगा के तेज बहाव के आगे ये नाकाफी साबित हो रहे हैं।

ग्रामीणों में आक्रोश और प्रशासनिक दावों की हकीकत

प्रभावित इलाकों के लोगों में जिला प्रशासन और जल संसाधन विभाग के खिलाफ गहरा आक्रोश व्याप्त है:

समय पर उपाय न होने का आरोप: ग्रामीणों का कहना है कि यदि मानसून और बाढ़ के आने से पहले ही विभाग द्वारा ठोकर (Spur) बनाने या पक्की बैरिकेडिंग का काम किया जाता, तो आज यह दिन नहीं देखना पड़ता। हर साल कटाव के वक्त अधिकारी सिर्फ आश्वासन देकर चले जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई ठोस और स्थायी काम नहीं होता।

पुनर्वास की मांग: विस्थापित हो रहे लोगों ने सरकार और जिला प्रशासन से मांग की है कि उन्हें तुरंत सुरक्षित जमीन का प्लॉट और मुआवजा दिया जाए, ताकि वे अपने परिवार को इस आपदा से बचा सकें।

सबौर के रजंदीपुर पंचायत के संतनगर और शंकरपुर गांव में गंगा नदी द्वारा मचाया जा रहा यह तांडव प्रशासनिक और विकासात्मक दावों की पोल खोल रहा है। पीसीसी सड़क का नदी में समा जाना और लोगों का अपने ही घरों को छोड़कर पलायन करना यह साबित करता है कि कटावरोधी उपाय कितने नाकाफी साबित हो रहे हैं। इस वक्त जरूरत इस बात की है कि सरकार और आपदा प्रबंधन विभाग युद्ध स्तर पर राहत कार्यों को चलाए और विस्थापितों का पुनर्वास सुनिश्चित करे, अन्यथा यह कटाव आने वाले दिनों में और भी बड़े इलाके को अपनी चपेट में ले सकता है।