कभी चंपानगर की पहचान हुआ करते थे पारंपरिक 'नाग कलश', आधुनिकता की आंधी और उपेक्षा से दम तोड़ती प्राचीन कला; अब शहर में सिर्फ एक जगह बचा है यह ऐतिहासिक कारोबार
भागलपुर (विशेष संवाददाता): इतिहास के पन्नों में अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, सूफी संतों की मजारों और रेशम की कला के लिए विश्वविख्यात भागलपुर का चंपानगर क्षेत्र कभी केवल 'सिल्क सिटी' के रूप में ही नहीं, बल्कि एक खास धार्मिक और पारंपरिक शिल्प के लिए भी जाना जाता था। यहां बनने वाले 'नाग कलश' (Nag Kalash) कभी घर-घर की आस्था और नाग पंचमी जैसे पर्वों की पहचान हुआ करते थे। एक दौर ऐसा था जब चंपानगर की गलियों और कुम्हार टोलियों में सैकड़ों कारीगर दिन-रात चाक चलाकर कलात्मक नाग कलश का निर्माण करते थे और यहां से ये कलश देश के विभिन्न हिस्सों में भेजे जाते थे। लेकिन, वक्त का पहिया ऐसा घूमा कि आधुनिकता की दौड़, प्लास्टिक-फाइबर के सामानों के बढ़ते चलन और सरकारी संरक्षण के अभाव में यह प्राचीन लोक-शिल्प लगभग विलुप्त होने की कगार पर पहुंच चुका है। आज स्थिति यह है कि पूरे चंपानगर और आसपास के इलाके में नाग कलश बनाने वाला यह पारंपरिक कारोबार सिमटकर सिर्फ एक ही ठिकाने पर बचा रह गया है, जहां इकलौता परिवार इस विरासत को किसी तरह जिंदा रखे हुए है।
क्या है नाग कलश और इसका धार्मिक व सांस्कृतिक महत्व?
सनातन संस्कृति और खासकर अंग क्षेत्र (भागलपुर और आसपास का इलाका) की लोक परंपराओं में नाग पंचमी और मनसा पूजा का विशेष स्थान है।
सांपों के देवता को समर्पित शिल्प: नाग कलश मिट्टी से बना एक विशेष प्रकार का अलंकृत कलश होता है, जिसके ऊपर नाग देवता (सर्प) की कलात्मक आकृतियां उभरी होती हैं। नाग पंचमी के अवसर पर ग्रामीण और शहरी परिवारों द्वारा इन कलशों की स्थापना की जाती है और दूध-लावा चढ़ाकर सर्प देवता की पूजा की जाती है ताकि परिवार को सर्प दोष और अकाल मृत्यु से मुक्ति मिल सके।
पारंपरिक कला की बारीकियां: इन कलशों को बनाने में साधारण कुम्हारी कला से हटकर विशेष कौशल की आवश्यकता होती है। गीली चिकनी मिट्टी पर हाथों से सांप के फन, शरीर के बल और अन्य पौराणिक आकृतियों को उकेरना एक जटिल और धैर्य का काम है, जिसे केवल उस्ताद कारीगर ही जानते थे।
स्वर्ण युग: जब चंपानगर के हर घर में गूंजती थी चाक की आवाज
बुजुर्ग कारीगरों और स्थानीय इतिहास के जानकारों की मानें तो तीन-चार दशक पहले चंपानगर का यह कुटीर उद्योग अपने चरम पर था:
रोजगार का बड़ा जरिया: सावन के महीने से महीनों पहले से यहां के दर्जनों परिवार नाग कलश ढालने और उन्हें पकाने के काम में जुट जाते थे। चंपानगर की चाक पर बनने वाले इन कलशों की मांग केवल भागलपुर जिले में ही नहीं, बल्कि पड़ोसी जिलों और झारखंड के कई इलाकों तक थी।
आर्थिक संबल: इस पैतृक कला से जुड़े परिवारों की आजीविका पूरी तरह इसी कारोबार पर टिकी थी। पीढ़ी-दर-पीढ़ी युवा इस हुनर को सीखते थे और अपने पुरखों की इस विरासत को आगे बढ़ाते थे।
पतन की ओर कैसे बढ़ा यह कारोबार? (बदलाव के मुख्य कारण)
समय के साथ समाज और बाजार में आए भारी बदलावों ने इस अनूठी लोक कला को गहरी चोट पहुंचाई:
प्लास्टिक और रेडीमेड मूर्तियों का आगमन: आजकल बाजारों में पीओपी (Plaster of Paris) और प्लास्टिक से बनी रेडीमेड नाग मूर्तियां व कलश कम कीमत पर आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। आधुनिकता की अंधी दौड़ में लोग पारंपरिक मिट्टी के कलशों की जगह इन कृत्रिम विकल्पों को अपनाने लगे हैं।
महंगी मिट्टी और ईंधन: चाक चलाने वाले कुम्हारों के लिए सिल्क सिटी में अब उपजाऊ चिकनी मिट्टी मिलना और कलश पकाने के लिए लकड़ी या कोयला खरीदना बेहद महंगा हो गया है। उत्पादन लागत बढ़ने और उचित मूल्य न मिलने के कारण युवा पीढ़ी ने इस काम से मुंह मोड़ लिया।
सरकारी उपेक्षा: पारंपरिक कुटीर उद्योगों को पुनर्जीवित करने के लिए प्रशासनिक स्तर पर मिलने वाली मदद और प्रोत्साहन इस तक नहीं पहुंच पाया, जिससे यह कला दम तोड़ती चली गई।
अंतिम कड़ी: अब सिर्फ एक जगह बचा है यह पुश्तैनी कारोबार
कभी चंपानगर के कोने-कोने में दिखने वाले नाग कलश बनाने के कारखाने आज गायब हो चुके हैं। वर्तमान में चंपानगर में केवल एक ऐसा परिवार बचा है, जो विपरीत परिस्थितियों और आर्थिक तंगी के बावजूद इस परंपरा की आखिरी मशाल जलाए हुए है:
पीढ़ी की आखिरी उम्मीद: इस परिवार के बुजुर्ग कारीगर का कहना है कि वे अपने पुरखों की इस निशानी को पैसों के लिए नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति और परंपरा के प्रति निष्ठा के कारण बचाए हुए हैं।
सीमित उत्पादन और मेहनत: अब वे सावन और नागपंचमी के सीजन में केवल गिने-चुने कलश ही तैयार कर पाते हैं। दिन-रात की मेहनत के बाद भी जब मुनाफा नहीं मिलता, तो परिवार के युवा मजबूरी में अन्य छोटे-मोटे रोजगार या मजदूरी की तरफ रुख कर रहे हैं।
बचाव की गुहार: क्या इस धरोहर को बचाया जा सकेगा?
सांस्कृतिकविदों और स्थानीय प्रबुद्ध नागरिकों का मानना है कि यदि सरकार, जिला प्रशासन और कला-संस्कृति विभाग ने समय रहते इस ओर ध्यान नहीं दिया, तो आने वाले कुछ वर्षों में चंपानगर से नाग कलश बनाने की यह इकलौती आखिरी दुकान भी हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएगी।
शिल्पकारों को प्रोत्साहन की दरकार: यदि इन पारंपरिक कारीगरों को आर्थिक सहायता, ब्याजमुक्त ऋण, मिट्टी की सुलभ उपलब्धता और मेलों-प्रदर्शनी में स्टॉल लगाने का अवसर मिले, तो इस मृतप्रायः कला को फिर से संजीवनी मिल सकती है।
नई पीढ़ी को प्रशिक्षण: स्कूलों और कॉलेजों के छात्रों को इस लोक कला से रूबरू कराने के लिए कार्यशालाएं आयोजित की जानी चाहिए ताकि हमारी सांस्कृतिक जड़ें मजबूत बनी रहें।
चंपानगर में सिमटता नाग कलश का यह कारोबार केवल एक मिट्टी के बर्तन के विलुप्त होने की कहानी नहीं है, बल्कि यह हमारी उस समृद्ध लोक-संस्कृति के क्षरण की दास्तान है जो कभी हमारी पहचान हुआ करती थी। आधुनिकता की चमक के बीच हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमारी असली विरासत ऐसे ही पारंपरिक हुनरमंदों के हाथों में बसी है। अब देखना यह होगा कि क्या भागलपुर की यह आखिरी बची दुकान इस विरासत को आगे बढ़ा पाएगी या प्रशासनिक उदासीनता के चलते यह परंपरा हमेशा के लिए इतिहास बनकर रह जाएगी।