भागलपुर की मुख्य सड़कों और चौराहों पर लगे अवैध यूनीपोल बन रहे मौत का बुलावा विज्ञापनों की चमक से बढ़ रहा भीषण सड़क हादसों का खतरा, जिम्मेदार विभाग बने हैं अनजान

भागलपुर: सिल्क सिटी के नाम से मशहूर भागलपुर शहर में इन दिनों विकास और सौंदर्यीकरण के दावों के बीच एक ऐसी खतरनाक हकीकत पनप रही है जो रोजाना नागरिकों की जान पर भारी पड़ रही है। शहर की मुख्य सड़कों, व्यस्त चौराहों, गोलंबरों और फ्लाईओवरों के पास बिना किसी मानक के धड़ल्ले से गाड़े गए विज्ञापनों वाले बड़े-बड़े यूनीपोल (Unipoles) अब मौत का खंभा बनते जा रहे हैं। इन यूनीपोलों की वजह से न सिर्फ चौराहों पर यातायात सिग्नल और दिशा-सूचक बोर्ड छिप जाते हैं, बल्कि रात के समय विज्ञापनों में इस्तेमाल होने वाली तेज और चमकती एलईडी लाइटें वाहन चालकों की आंखों को चौंधिया देती हैं, जिससे पलक झपकते ही भयानक सड़क हादसे हो रहे हैं। आए दिन इन जानलेवा यूनीपोलों के कारण लोग दुर्घटनाओं का शिकार होकर अस्पताल पहुंच रहे हैं, लेकिन नगर निगम, जिला प्रशासन और विज्ञापन एजेंसियों की मिलीभगत के कारण इस गंभीर समस्या पर आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है।

पिछले कुछ वर्षों में शहर के भीतर व्यावसायिक विज्ञापनों (Commercial Advertisements) के जरिए राजस्व कमाने की होड़ में मुख्य सड़कों और चौराहों के इर्द-गिर्द यूनीपोल लगाने का कारोबार बेकाबू हो गया है:

मानकों की अनदेखी: नियमों के मुताबिक किसी भी चौराहे या मोड़ से कम से कम निश्चित दूरी पर ही विज्ञापन होर्डिंग या यूनीपोल लगाए जाने चाहिए, ताकि ड्राइवरों का विजन क्लियर रहे। लेकिन भागलपुर में ट्रैफिक पुलिस चौकियों, सिग्नल लाइटों और अगदी चौराहे के ठीक बीचों-बीच या टर्न लेते ही ये विशालकाय यूनीपोल खड़े कर दिए गए हैं।

दृश्यता (Visibility) में भारी बाधा: जब कोई वाहन चालक किसी व्यस्त चौराहे से मुड़ता है, तो सामने अचानक यूनीपोल का खंभा या उस पर टंगा बड़ा बोर्ड आ जाता है, जिससे दूसरी तरफ से आ रही गाड़ियां या पैदल चल रहे लोग दिखाई नहीं देते और आमने-सामने की टक्कर हो जाती है।

चौराहों पर यूनीपोल से होने वाले प्रमुख खतरे

शहर के विभिन्न हिस्सों जैसे कचहरी चौक, घंटाघर, खलीफाबाग चौक, स्टेशन चौक, और बायपास रोड के पास लगे ये यूनीपोल कई तरह के गंभीर खतरे पैदा कर रहे हैं:

चालकों की नजरें चौंधियाना (LED Glare):

आधुनिक यूनीपोलों में रात के समय ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए हाई-इंटेंसिटी वाली एलईडी लाइटें और ब्लिंकिंग स्क्रीन्स लगाई जाती हैं।

जब वाहन चालक इन चौराहों से गुजरते हैं, तो अचानक पड़ने वाली इस तेज रोशनी से उनकी आंखें कुछ सेकंड के लिए काम करना बंद कर देती हैं (Night Blindness Effect), जिससे अनियंत्रित होकर गाड़ियां डिवाइडर या राहगीरों से टकरा जाती हैं।

यातायात संकेतों (Traffic Signals) का छिप जाना:

कई चौराहों पर ट्रैफिक पुलिस के बोर्ड, स्पीड लिमिट के निर्देश या गोलंबर के नियम इन बड़े-बड़े विज्ञापनों के पीछे पूरी तरह छिप जाते हैं। बाहरी जिलों से आने वाले नए चालकों को रास्ता समझ नहीं आता और वे असमंजस में दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं।

तूफान और आंधी में गिरने का खतरा:

इनमें से कई यूनीपोल बिना मजबूत फाउंडेशन के केवल लोहे की चादरों और कमजोर नट-बोल्ट पर टिके हैं। मानसून या तेज आंधी-तूफान के दौरान इनके गिरने का खतरा बना रहता है, जिससे किसी भी दिन बड़ा जानी नुकसान हो सकता है।

प्रशासनिक उदासीनता और राजस्व का खेल

इस पूरे मामले का सबसे डरावना पहलू यह है कि सब कुछ प्रशासनिक नाक के नीचे हो रहा है:

अवैध और बिना अनुमति के लगे बोर्ड: जानकारों का आरोप है कि शहर में लगे दर्जनों यूनीपोल अवैध हैं या फिर उन्हें अनुमति से अधिक आकार में स्थापित किया गया है। नगर निगम के विज्ञापन सेल को इससे हर महीने मोटी कमाई होती है, शायद यही वजह है कि अधिकारी इस जानलेवा लापरवाही पर आंखें मूंदकर बैठे हैं।

दुर्घटनाओं के बाद भी चुप्पी: सड़क हादसों में जब कोई घायल होता है या उसकी जान जाती है, तो पुलिस प्राथमिकी दर्ज कर खानापूर्ति कर देती है, लेकिन आज तक किसी भी जिम्मेदार एजेंसी या अधिकारी पर यह तय नहीं किया गया कि चौराहे के पास यह खतरनाक यूनीपोल लगाने की अनुमति किसने दी थी।

आम नागरिकों और चालकों का दर्द

शहर की सड़कों पर वाहन चलाने वाले आम लोगों, ऑटो चालकों और युवाओं ने इस पर अपना गहरा गुस्सा जाहिर किया है:

"सौंदर्यीकरण के नाम पर मौत का जाल": नागरिकों का कहना है कि प्रशासन शहर को चमकाने के नाम पर चौराहों पर विज्ञापनों की भरमार कर रहा है, जिससे सड़कें सुरक्षित होने के बजाय रेस ट्रैक और खतरनाक जोन बनती जा रही हैं।

त्वरित हटाने की मांग: शहर के प्रबुद्ध नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने जिला प्रशासन और नगर आयुक्त को ज्ञापन सौंपकर मांग की है कि सभी मुख्य चौराहों से तत्काल प्रभाव से इन जानलेवा यूनीपोलों को हटाया जाए।

मुख्य सड़कों और चौराहों के पास सजे विज्ञापनों के ये यूनीपोल इस बात का जीता-जागता सबूत हैं कि किस तरह व्यावसायिक लाभ के आगे आम जनता की जान को ताक पर रख दिया जाता है। विज्ञापन जरूरी हो सकते हैं, लेकिन किसी की जिंदगी से बढ़कर नहीं। अब वक्त आ गया है कि भागलपुर जिला प्रशासन और नगर निगम गहरी नींद से जागे। किसी बड़े हादसे का इंतजार किए बिना, शहर के तमाम चौराहों की मैपिंग कराई जाए और यातायात को बाधित करने वाले सभी अवैध एवं खतरनाक यूनीपोलों को अविलंब उखाड़ फेंका जाए, ताकि शहर की सड़कें नागरिकों के लिए सुरक्षित बन सकें।