भागलपुर में पानी निकासी के अभाव और भूमि विवाद के कारण चार से पांच महीने तक नारकीय जीवन जीने को मजबूर ग्रामीण; प्रशासनिक उदासीनता पर उठे सवाल
भागलपुर (विशेष संवाददाता): विकास के लाख दावों और स्मार्ट सिटी की आधुनिक योजनाओं के बीच भागलपुर जिले के ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों की एक ऐसी कड़वी सच्चाई सामने आती है, जो प्रशासनिक दावों की हवा निकाल देती है। जिले के कई क्षेत्रों में जल निकासी (Water Drainage) की लचर व्यवस्था और आए दिन खड़े होने वाले जमीन विवाद (Land Disputes) ने आम जनजीवन को पूरी तरह बेपटरी कर दिया है। स्थिति यह है कि इन दो बड़ी समस्याओं के कारण इन इलाकों के लोगों को साल भर में चार से पांच महीने तक बेहद नारकीय और दयनीय स्थिति में जीने को मजबूर होना पड़ता है। हल्की सी बारिश से लेकर मानसून के महीनों तक खेत-खलिहान और गलियां तालाब में तब्दील हो जाती हैं, और जब ग्रामीण अपने स्तर पर पानी की निकासी का रास्ता बनाना चाहते हैं, तो आपसी भूमि विवाद या दबंगई आड़े आ जाती है।
क्या है पूरी समस्या और क्यों गंभीर रूप ले रही है यह स्थिति?
भागलपुर के ग्रामीण आंचल और प्रखंडों से जुड़े कई गांवों की भौगोलिक और प्रशासनिक बनावट ऐसी है जहां जल निकासी के लिए कोई विधिवत नाला या चैनल मौजूद नहीं है:
प्राकृतिक जलमार्गों का अतिक्रमण: दशकों पहले खेतों और गांवों से पानी निकलने के लिए जो प्राकृतिक नाले या ढलान हुआ करती थी, उस पर अंधाधुंध अवैध कब्जे (Encroachments) हो चुके हैं। लोगों ने पानी के बहाव के रास्तों पर घर, चहारदीवारी या दुकानें बना ली हैं, जिससे पानी की निकासी पूरी तरह ठप हो गई है।
जमीन विवाद का पेच: जब भी स्थानीय लोग या पंचायत स्तर पर प्रशासन कोई नया नाला बनवाने या पुराने रास्ते से पानी निकालने का प्रयास करता है, तो बीच में 'जमीन विवाद' का भूत खड़ा हो जाता है। कोई भी रैयत या भू-स्वामी अपनी जमीन से पानी गुजरने देने को तैयार नहीं होता, और आपसी रंजिश व कानूनी दांव-पेंच के कारण मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है।
साल के चार से पांच महीने: जलभराव और कीचड़ में गुजरता जीवन
इन समस्याओं का सबसे भयानक रूप तब देखने को मिलता है जब बारिश का मौसम शुरू होता है और यह स्थिति साल के चार से पांच महीने तक बनी रहती है:
बारिश का पानी और घरों में घुसना: जून से लेकर अक्टूबर-नवंबर तक (मानसून और उसके बाद भी) जल जमाव की स्थिति बनी रहती है। गलियों और सड़कों पर दो से तीन फीट तक गंदा पानी भरा रहता है, जो कई बार लोगों के घरों के अंदर तक घुस जाता है।
संक्रामक बीमारियों का खतरा: महीनों तक जमा रहने वाले इस गंदे पानी से उठने वाली सड़न और दुर्गंध के कारण मलेरिया, डेंगू, डायरिया और चर्म रोग जैसी गंभीर बीमारियां महामारी का रूप लेने लगती हैं। बच्चों और बुजुर्गों के लिए घर से बाहर निकलना दूभर हो जाता है।
कृषि और आजीविका पर चोट: किसानों के खेतों में पानी भरा रहने के कारण वे समय पर अगली फसल की बुआई या कटाई नहीं कर पाते। पशुओं के लिए चारा लाना भी मुश्किल हो जाता है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भारी क्षति उठानी पड़ती है।
प्रशासनिक कागजों में उलझ कर रह जाती है योजनाएं
जब ग्रामीण अपनी इस पीड़ा को लेकर प्रखंड कार्यालय से लेकर जिला मुख्यालय तक गुहार लगाते हैं, तो उन्हें केवल आश्वासन के सिवाय कुछ नहीं मिलता:
अधिकारियों की उदासीनता: अंचल अधिकारी (CO) और प्रखंड विकास पदाधिकारी (BDO) अक्सर इस बात का रोना रोते हैं कि जब तक जमीन का विवाद कोर्ट या आपसी सहमति से सुलझ नहीं जाता, वे नाला निर्माण या पानी निकासी का रास्ता नहीं बनवा सकते।
आपसी समन्वय की कमी: अंचल कार्यालय, पुलिस प्रशासन और ग्रामीण विकास विभाग के बीच समन्वय की कमी के कारण समस्या जस की तस बनी रहती है। पुलिस बल के अभाव या कागजी खानापूर्ति के चलते जमीन विवाद का कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाता।
आम जनता की पीड़ा और आक्रोश
प्रभावित इलाकों के ग्रामीणों का कहना है कि वे हर साल वोट देते हैं, जनप्रतिनिधि बदलते हैं, वादे किए जाते हैं, लेकिन उनकी बुनियादी समस्या का समाधान कभी नहीं होता:
"नर्क में जीने को मजबूर हैं हम": स्थानीय महिलाओं और युवाओं का कहना है कि बच्चों को स्कूल भेजने के लिए भी गंदे पानी से होकर गुजरना पड़ता है। कई बार साइकिल और बाइक सवार पानी भरे गड्ढों में गिरकर चोटिल हो जाते हैं।
प्रशासन से त्वरित हस्तक्षेप की मांग: ग्रामीणों ने जिला प्रशासन को चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही जल निकासी के लिए कोई स्थायी चैनल नहीं बनाया गया और भूमि विवाद का निपटारा कर रास्ता नहीं निकाला गया, तो वे बड़े पैमाने पर आंदोलन करने को बाध्य होंगे।
समाधान की दिशा में क्या होने चाहिए कदम?
विशेषज्ञों और स्थानीय बुद्धिजीवियों का मानना है कि इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए प्रशासन को फौरी और ठोस कदम उठाने होंगे:
सरकारी भूमि की पैमाइश: राजस्व विभाग की टीम को लगाकर गांव के पारंपरिक जलमार्गों (आहर, पाइन और सरकारी रास्तों) को अतिक्रमण मुक्त कराया जाए।
मास्टर ड्रेनेज प्लान: मनरेगा या अन्य ग्रामीण विकास योजनाओं के तहत सुदृढ़ और पक्के ड्रेनेज सिस्टम का निर्माण किया जाए ताकि पानी का निकास सुगम हो सके।
सख्त कानूनी कार्रवाई: पानी के प्राकृतिक बहाव को रोकने वाले या जबरन विवाद पैदा करने वाले तत्वों से सख्ती से निपटा जाए।
भागलपुर के ग्रामीण इलाकों में पानी निकासी की कमी और जमीन विवाद के चलते चार से पांच महीने तक नारकीय जीवन जीने की यह विवशता प्रशासनिक संवेदनशीलता पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाती है। जब तक प्रशासन कागजी बहसों से बाहर निकलकर धरातल पर कड़े कदम नहीं उठाता, तब तक इन क्षेत्रों के लोगों की मुश्किलें कम होने वाली नहीं हैं। यह समय की मांग है कि सरकार और जिला प्रशासन इस ओर विशेष ध्यान दे, ताकि अन्नदाता और आम ग्रामीण भी सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन जी सकें।