पांच वर्षों में लगाए गए 20 लाख से अधिक पौधे, संरक्षण की कमी से 30 से 40 प्रतिशत पौधों के सूखने का दावा; सही आंकड़ों की जरूरत
मुंगेर। जिले में हरियाली का दायरा बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण को मजबूत करने के उद्देश्य से पिछले पांच वर्षों में बड़े पैमाने पर पौधारोपण अभियान चलाया गया। विभिन्न सरकारी विभागों, स्थानीय संस्थाओं और सामुदायिक स्तर पर किए गए प्रयासों के तहत 20 लाख से अधिक पौधे लगाए जाने की जानकारी सामने आई है। पौधारोपण के आंकड़े निश्चित रूप से पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बड़े अभियान की तस्वीर पेश करते हैं, लेकिन इन पौधों के संरक्षण और उनके जीवित रहने की स्थिति को लेकर सवाल भी उठ रहे हैं।
स्थानीय स्तर पर सामने आई जानकारी के अनुसार लगाए गए पौधों में करीब 30 से 40 प्रतिशत पौधे उचित देखभाल के अभाव में सूख गए। यदि यह अनुमान सही है तो बड़ी संख्या में पौधे लगाने के बावजूद उनके संरक्षण की चुनौती गंभीर है। ऐसे में अब केवल पौधारोपण की संख्या को उपलब्धि मानने के बजाय इस बात की निगरानी जरूरी हो गई है कि लगाए गए पौधों में कितने वास्तव में जीवित हैं और कितने पेड़ के रूप में विकसित हो रहे हैं।
पांच वर्षों में 20 लाख से अधिक पौधे लगाने का दावा
मुंगेर जिले में हरियाली बढ़ाने के लिए पिछले पांच वर्षों के दौरान अलग-अलग स्थानों पर पौधारोपण किया गया। सरकारी भूमि, सड़क किनारे, सार्वजनिक परिसरों, शिक्षण संस्थानों, पंचायत क्षेत्रों और अन्य उपयुक्त स्थानों पर पौधे लगाए गए।
इस अभियान का उद्देश्य जिले के हरित क्षेत्र को बढ़ाना और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना रहा। बढ़ते शहरीकरण और निर्माण गतिविधियों के बीच पेड़ों की संख्या बढ़ाना स्थानीय पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
पौधारोपण अभियान के दौरान फलदार, छायादार और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल विभिन्न प्रजातियों के पौधे लगाए गए। हालांकि अलग-अलग विभागों और योजनाओं के तहत लगाए गए पौधों की संख्या, स्थान और उनकी वर्तमान स्थिति का समेकित रिकॉर्ड सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होना जरूरी है।
संरक्षण की कमी बनी बड़ी चुनौती
पौधा लगाने के बाद उसकी नियमित देखभाल नहीं होने पर उसके जीवित रहने की संभावना कम हो जाती है। शुरुआती वर्षों में पौधे को पर्याप्त पानी, खाद, सुरक्षा और देखरेख की जरूरत होती है।
मुंगेर में भी पौधारोपण के बाद कई स्थानों पर पौधों के संरक्षण को लेकर समस्याएं सामने आने की बात कही जा रही है। गर्मी के मौसम में पानी की कमी, पशुओं से नुकसान, सड़क निर्माण और अन्य गतिविधियों के कारण पौधों को नुकसान पहुंच सकता है।
यदि पौधों के चारों ओर सुरक्षा घेरा नहीं हो और नियमित सिंचाई की व्यवस्था न हो तो बड़ी संख्या में पौधे सूख सकते हैं।
30 से 40 प्रतिशत पौधों के सूखने का अनुमान
उपलब्ध जानकारी में लगाए गए पौधों में 30 से 40 प्रतिशत के सूखने की बात कही गई है। हालांकि यह आंकड़ा अनुमान या स्थानीय आकलन पर आधारित हो सकता है। इसकी वास्तविक स्थिति जानने के लिए विभागवार और स्थानवार सर्वे की आवश्यकता होगी।
यदि 20 लाख से अधिक पौधों को आधार माना जाए तो 30 से 40 प्रतिशत की क्षति का मतलब लाखों पौधों का जीवित न रह पाना हो सकता है। यह स्थिति पौधारोपण अभियान की प्रभावशीलता और उसके बाद की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
इसलिए केवल पौधारोपण के आंकड़े जारी करने के बजाय पौधों की जीवितता दर भी सार्वजनिक की जानी चाहिए।
सही आंकड़ों की जरूरत
पर्यावरण संरक्षण से जुड़े अभियानों में पारदर्शी आंकड़े बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। जिले में पिछले पांच वर्षों में कितने पौधे लगाए गए, कितने पौधे जीवित हैं, कितने सूख चुके हैं और कितने पेड़ के रूप में विकसित हो चुके हैं—इसकी जानकारी अलग-अलग स्तर पर दर्ज की जानी चाहिए।
इसके लिए प्रत्येक पौधारोपण स्थल का रिकॉर्ड तैयार किया जा सकता है। रिकॉर्ड में पौधारोपण की तारीख, पौधों की संख्या, प्रजाति, स्थान, जिम्मेदार विभाग या संस्था और वर्तमान स्थिति दर्ज की जा सकती है।
ऐसा होने पर भविष्य में पौधारोपण की सफलता का वास्तविक मूल्यांकन किया जा सकेगा।
पौधारोपण से अधिक जरूरी संरक्षण
पर्यावरण विशेषज्ञ लंबे समय से यह बात कहते रहे हैं कि केवल पौधे लगाने से हरित क्षेत्र नहीं बढ़ता। वास्तविक सफलता तब मानी जाती है जब पौधे कई वर्षों तक जीवित रहें और बड़े होकर पेड़ बनें।
एक पौधे को लगाने में जितना संसाधन खर्च होता है, उसके संरक्षण में भी नियमित प्रयास की जरूरत होती है। यदि पौधा लगाने के कुछ महीनों बाद ही सूख जाता है तो अभियान का उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता।
इसलिए भविष्य के अभियानों में पौधारोपण के साथ कम से कम शुरुआती वर्षों तक उसके संरक्षण की जिम्मेदारी तय करना जरूरी होगा।
गर्मी और पानी की कमी का असर
मुंगेर सहित बिहार के कई हिस्सों में गर्मी के दौरान तापमान बढ़ने से नए पौधों के लिए पानी की उपलब्धता बड़ी चुनौती बन जाती है।
बारिश के मौसम में पौधारोपण करने के बावजूद बाद के महीनों में नियमित सिंचाई नहीं होने पर पौधों के सूखने की संभावना बढ़ जाती है।
ऐसे में पौधारोपण स्थल के आसपास पानी की व्यवस्था और सिंचाई की नियमित योजना तैयार करना जरूरी है। पंचायत, स्थानीय निकाय और संबंधित विभाग मिलकर इस दिशा में जिम्मेदारी तय कर सकते हैं।
पशुओं से सुरक्षा भी जरूरी
ग्रामीण और खुले क्षेत्रों में लगाए गए पौधों को पशुओं से नुकसान होने की संभावना रहती है। कई बार पौधों के आसपास सुरक्षा घेरा नहीं होने के कारण वे मवेशियों द्वारा नष्ट कर दिए जाते हैं।
छोटे पौधों की सुरक्षा के लिए ट्री गार्ड या अन्य स्थानीय व्यवस्था की जा सकती है। सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से भी पौधों की निगरानी की जा सकती है।
यदि किसी गांव या पंचायत में लगाए गए पौधों की जिम्मेदारी स्थानीय समूहों को दी जाए तो उनके संरक्षण की संभावना बढ़ सकती है।
सड़क किनारे पौधारोपण में अतिरिक्त सावधानी
सड़क किनारे लगाए गए पौधों को कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। सड़क चौड़ीकरण, नालियों का निर्माण, बिजली और दूरसंचार के काम तथा अन्य विकास गतिविधियों के दौरान पौधे क्षतिग्रस्त हो सकते हैं।
इसलिए सड़क परियोजनाओं और पौधारोपण योजनाओं के बीच समन्वय जरूरी है।
जहां सड़क निर्माण या चौड़ीकरण प्रस्तावित हो, वहां पहले से लगाए गए पेड़ों और पौधों की स्थिति का रिकॉर्ड रखा जाना चाहिए।
स्कूल और सामुदायिक संस्थाओं की भूमिका
पौधों के संरक्षण में स्कूल, कॉलेज और स्थानीय सामुदायिक संस्थाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
यदि किसी स्कूल परिसर में पौधे लगाए जाते हैं तो छात्रों और शिक्षकों को उनके संरक्षण से जोड़ा जा सकता है। इससे बच्चों में पर्यावरण के प्रति जागरूकता भी बढ़ेगी।
इसी तरह पंचायत स्तर पर पौधारोपण स्थलों की निगरानी के लिए स्थानीय समितियां बनाई जा सकती हैं।
जीवितता दर पर हो निगरानी
भविष्य में पौधारोपण अभियान की सफलता मापने के लिए सर्वाइवल रेट यानी पौधों की जीवितता दर को मुख्य मानक बनाया जा सकता है।
उदाहरण के लिए, यदि किसी स्थान पर 1,000 पौधे लगाए गए हैं तो एक वर्ष, तीन वर्ष और पांच वर्ष बाद कितने पौधे जीवित हैं, इसका रिकॉर्ड रखा जा सकता है।
इससे यह पता चलेगा कि कौन सी प्रजातियां और कौन से स्थान पौधारोपण के लिए अधिक उपयुक्त हैं।
स्थानीय प्रजातियों को प्राथमिकता
स्थानीय जलवायु और मिट्टी के अनुकूल प्रजातियों का चयन पौधों के जीवित रहने की संभावना बढ़ा सकता है।
ऐसे पौधे जो स्थानीय पर्यावरण में आसानी से विकसित होते हैं, उन्हें प्राथमिकता देने से देखभाल का बोझ भी कम हो सकता है।
पौधारोपण से पहले मिट्टी, पानी की उपलब्धता और स्थान की परिस्थितियों का अध्ययन करना उपयोगी होगा।
डिजिटल निगरानी से बढ़ सकती है पारदर्शिता
तकनीक की मदद से पौधारोपण अभियान की निगरानी को बेहतर बनाया जा सकता है। प्रत्येक पौधारोपण स्थल की तस्वीर, लोकेशन और पौधों की संख्या डिजिटल रिकॉर्ड में दर्ज की जा सकती है।
समय-समय पर उसी स्थान की तस्वीर लेकर पौधों की स्थिति की तुलना की जा सकती है।
इससे फर्जी आंकड़ों या केवल कागजी पौधारोपण की संभावना को कम करने में मदद मिल सकती है।
जनता की भागीदारी जरूरी
सरकारी प्रयासों के साथ आम लोगों की भागीदारी भी आवश्यक है। यदि स्थानीय लोग लगाए गए पौधों को अपने आसपास की संपत्ति की तरह समझें तो उनका संरक्षण बेहतर तरीके से हो सकता है।
गांवों, मोहल्लों और सार्वजनिक स्थलों पर पौधों की देखभाल की सामुदायिक व्यवस्था बनाई जा सकती है।
स्थानीय युवाओं और स्वयंसेवी संगठनों को भी इस अभियान से जोड़ा जा सकता है।
पौधारोपण अभियान का वास्तविक उद्देश्य
पौधारोपण का उद्देश्य केवल संख्या बढ़ाना नहीं बल्कि लंबे समय में हरित क्षेत्र का विस्तार करना है। एक स्वस्थ और बड़ा पेड़ कई वर्षों तक पर्यावरण को लाभ पहुंचाता है।
पेड़ वायु गुणवत्ता सुधारने, तापमान को नियंत्रित करने, मिट्टी के संरक्षण और जैव विविधता को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इसलिए लगाए गए पौधों को पेड़ बनने तक सुरक्षित रखना ही किसी पौधारोपण अभियान की वास्तविक सफलता होगी।
आगे की रणनीति पर ध्यान जरूरी
मुंगेर में पहले से लगाए गए पौधों की वर्तमान स्थिति का सर्वे कराया जाना उपयोगी होगा। इस सर्वे के आधार पर यह पता लगाया जा सकता है कि किन क्षेत्रों में संरक्षण की कमी रही और किन स्थानों पर पौधों की जीवितता दर बेहतर रही।
जहां बड़ी संख्या में पौधे सूख गए हैं, वहां आवश्यकता के अनुसार दोबारा पौधारोपण किया जा सकता है।
साथ ही भविष्य में पौधारोपण के साथ संरक्षण के लिए अलग बजट और जिम्मेदार अधिकारियों या संस्थाओं की स्पष्ट जवाबदेही तय की जा सकती है।
मुंगेर जिले में पिछले पांच वर्षों के दौरान 20 लाख से अधिक पौधों का रोपण किया जाना पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ा अभियान माना जा सकता है। लेकिन यदि लगाए गए पौधों में से 30 से 40 प्रतिशत पौधे संरक्षण और देखभाल की कमी के कारण सूख गए हैं, तो यह चिंता का विषय है।
इस दावे की वास्तविकता सामने लाने के लिए विभागवार, स्थानवार और वर्षवार आंकड़ों का सत्यापन जरूरी है। कितने पौधे लगाए गए और कितने जीवित हैं, इसका स्पष्ट रिकॉर्ड सार्वजनिक होने से अभियान की वास्तविक सफलता का आकलन किया जा सकेगा।
अब जरूरत केवल नए पौधे लगाने की नहीं, बल्कि पहले से लगाए गए पौधों को बचाने की है। नियमित सिंचाई, सुरक्षा घेरा, स्थानीय निगरानी, डिजिटल रिकॉर्ड और सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से पौधों की जीवितता दर बढ़ाई जा सकती है।
यदि पौधारोपण को केवल लक्ष्य पूरा करने के बजाय लंबे समय तक चलने वाले संरक्षण अभियान के रूप में लागू किया जाए, तो मुंगेर में आने वाले वर्षों में हरियाली का वास्तविक विस्तार संभव है। इससे जिले के पर्यावरण, जलवायु और आने वाली पीढ़ियों को स्थायी लाभ मिल सकता है।