आधे से अधिक कांवरिया कर रहे ऑनलाइन भुगतान, सुदूर कांवर मार्ग के अस्थायी दुकानदार और छोटे वेंडर भी अपना रहे यूपीआई (UPI) तकनीक
भागलपुर/देवघर (विशेष संवाददाता): देवघर और सुल्तानगंज के बीच लगने वाले विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेले में इस बार आस्था और आधुनिक तकनीक का एक ऐसा अनूठा संगम देखने को मिल रहा है, जो हर किसी को हैरान कर रहा है। सदियों से पारंपरिक नकद लेन-देन (कैश ट्रांजेक्शन) के लिए जाने जाने वाले इस कांवड़ मेले में इस वर्ष डिजिटल क्रांति ने पूरी तरह से पांव पसार लिए हैं। एक ताज़ा रिपोर्ट के मुताबिक, इस पावन मेले में आने वाले आधे से अधिक कांवरिया (लगभग 50% से ज्यादा श्रद्धालु) अब अपनी खरीदारी, खान-पान और पूजन सामग्री के भुगतान के लिए कैशलेस यानी ऑनलाइन माध्यमों का उपयोग कर रहे हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि केवल बड़े होटल या मॉल ही नहीं, बल्कि कांवर मार्ग पर कंकड़-पत्थर और झोपड़ियों के बीच अस्थाई दुकानें सजाकर बैठने वाले छोटे-छोटे वेंडर, चाय वाले, फल विक्रेता और पूजा सामग्री बेचने वाले दुकानदार भी धड़ल्ले से 'फोनपे', 'गूगल पे' और 'पेटीएम' जैसे यूपीआई (UPI) स्कैनर का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस बदलाव ने कांवरियों और दुकानदारों दोनों की राह बेहद आसान कर दी है।
कांवर मार्ग पर कैशलेस बहार: क्या है जमीनी हकीकत?
पारंपरिक रूप से यह माना जाता है कि धार्मिक मेलों और लंबी पदयात्राओं में नेटवर्क की समस्या और चिल्लर (खुले पैसे) की किल्लत के कारण कैश ही राजा होता है, लेकिन इस बार श्रावणी मेले की तस्वीर बिल्कुल अलग है:
जेब में कैश रखने की झंझट खत्म: 105 किलोमीटर लंबे सुल्तानगंज-देवघर मार्ग (असरगंज, कटोरिया, बांका, दुमका और देवघर रूट) पर चलने वाले कांवरिया अब अपने साथ भारी-भरकम नकदी रखने से बच रहे हैं। जेब में मोबाइल और गले में गमछा टांगे शिवभक्त चुटकियों में स्कैन एंड पे (Scan & Pay) कर रहे हैं।
खुदरा पैसे (चिल्लर) की समस्या से मुक्ति: पहले दुकानदारों और कांवरियों के बीच खुले पैसे को लेकर अक्सर बहस या मोलभाव होता रहता था। अब एक-एक, दो-दो रुपए के डिजिटल भुगतान ने इस पुरानी सिरदर्दी को पूरी तरह खत्म कर दिया है।
अस्थाई दुकानदारों की जुबानी: "डिजिटल पेमेंट से व्यापार हुआ आसान"
कांवर मेला केवल एक महीने का होता है, जिसके लिए स्थानीय ग्रामीण और छोटे कारोबारी अस्थायी दुकानें (झोपड़ीनुमा होटल, चाय-नाश्ता की दुकान, जूस कॉर्नर, और खिलौने की दुकानें) लगाते हैं। इस बार इन दुकानदारों में डिजिटल लेनदेन को लेकर जबरदस्त उत्साह देखा जा रहा है:
दुकानदार मोहन यादव का अनुभव: सुल्तानगंज से आगे कांवर मार्ग पर चाय की दुकान चलाने वाले मोहन यादव बताते हैं, "पहले कांवरियों के पास बड़े नोट होते थे और हमारे पास खुले पैसे नहीं होते थे, जिससे कई बार बिक्री रुक जाती थी। इस बार बैंक से क्यूआर कोड (QR Code) बनवाकर ले आए हैं। आधे से ज्यादा कांवरिया चाय पीने के बाद सीधे मोबाइल से पेमेंट कर देते हैं। इससे हिसाब रखना भी आसान हो गया है।"
सुरक्षा की चिंता हुई दूर: मेले में उमड़ने वाली भारी भीड़ के बीच जेबकतरों और चोरों का डर हमेशा बना रहता था। दुकानदारों का कहना है कि डिजिटल भुगतान होने से गल्ले (कैश बॉक्स) में ज्यादा नकदी रखने की जरूरत ही नहीं पड़ती, जिससे चोरी या छिनतई का खतरा काफी हद तक कम हो गया है।
टेक्नोलॉजी और आस्था का मेल: नेटवर्किंग और बैकिंग का सहयोग
इस बार के श्रावणी मेले में डिजिटल पेमेंट के इस बूम के पीछे कुछ प्रमुख कारण और प्रशासनिक प्रबंध भी हैं:
मोबाइल नेटवर्क का सुदृढ़ीकरण: पिछले कुछ वर्षों में टेलीकॉम कंपनियों (Jio, Airtel आदि) ने कांवर मार्ग पर नेटवर्क कनेक्टिविटी और टॉवरों की क्षमता को काफी बेहतर किया है, जिससे घने जंगलों और पहाड़ी इलाकों (जैसे कटोरिया और दुमका क्षेत्र) में भी यूपीआई ट्रांजेक्शन बिना किसी रुकावट के काम कर रहे हैं।
ग्रामीण इलाकों में डिजिटल साक्षरता: सरकार के 'डिजिटल इंडिया' अभियान का असर अब ग्रामीण और सुदूर इलाकों तक साफ देखा जा सकता है। ठेले वाले से लेकर बुजुर्ग दुकानदार तक स्मार्टफोन चलाना और पेमेंट के नोटिफिकेशन चेक करना सीख गए हैं।
युवा कांवरियों और तकनीक का प्रभाव
इस बार के मेले में बड़ी संख्या में युवा और तकनीक-प्रेमी (Tech-savvy) कांवरिया शामिल हैं, जो अपने दोस्तों या परिवार के साथ यात्रा कर रहे हैं:
डिजिटल वॉलेट और क्यूआर कोड का ट्रेंड: युवा कांवरियों का कहना है कि उन्हें पर्स या बटुआ साथ लेकर चलने की जरूरत ही महसूस नहीं होती। यात्रा के दौरान केवल एक स्मार्टफोन और यूपीआई ऐप्स उनके लिए काफी हैं।
पारदर्शिता और सुरक्षा: डिजिटल भुगतान से धोखाधड़ी या नकली नोटों के चलन की आशंका भी लगभग शून्य हो गई है, जिससे व्यापारी और खरीदार दोनों सुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
श्रावणी मेले में आधे से अधिक कांवरियों द्वारा ऑनलाइन भुगतान का उपयोग किया जाना और अस्थायी दुकानदारों द्वारा इसे अपनाना यह साबित करता है कि भारत का डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर अब देश के सबसे कठिन और पारंपारिक धार्मिक आयोजनों में भी अपनी गहरी जड़ें जमा चुका है। आस्था के इस महान पर्व में तकनीक का यह समावेश न केवल व्यवस्था को सुगम बना रहा है, बल्कि यह भी दिखा रहा है कि कैसे आधुनिक भारत के नागरिक परंपरा और प्रगति के साथ तालमेल बिठाकर आगे बढ़ रहे हैं।